जीते जी अपना श्राद्ध! आखिर कौन और क्यों करता है 'आत्म-श्राद्ध'? गरुड़ पुराण में छिपा है यह रहस्य
गरुड़ पुराण के अनुसार, 'आत्म-श्राद्ध' के कुछ नियम बनाए गए हैं और यह विशेष परिस्थितियों में किया जाता है। आइए जानें इसके बारे में कुछ जरूरी बातें।

गरुड़ पुराण में छिपा है आत्म श्राद्ध का रहस्य (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
आत्म-श्राद्ध विशेष परिस्थितियों में जीवित व्यक्ति करते हैं।
निःसंतान दंपति अपनी आत्मा की शांति हेतु यह करते हैं।
संन्यास ग्रहण करने से पहले भी आत्म-श्राद्ध की परंपरा है।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। श्राद्ध और तर्पण का नाम सुनकर आपके दिमाग में एक ही छवि आती है, वो होती है पूर्वजों की। वास्तव में मान्यता यह है कि श्राद्ध हमेशा उन लोगों का किया जाता है जो पृथ्वीलोक से जा चुके हैं, अर्थात जीवित नहीं हैं।
मुख्य रूप से जब पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों के लिए श्राद्ध होता है तो उसका एक मात्र उद्देश्य मृतक की आत्मा को शांति दिलाना और उनके लिए मोक्ष की कामना करना होता है।
वहीं एक सवाल यह भी सामने आता है कि क्या कोई व्यक्ति अपनी मृत्यु से पहले ही अपना श्राद्ध या तर्पण कर सकता है? आइए आपको बताते हैं गरुड़ पुराण में इस बात को लेकर क्या कहा गया है और आत्म श्राद्ध कब किया जाता है?
क्या जीवित व्यक्ति अपना ही श्राद्ध कर सकता है?
अगर हम आत्म श्राद्ध की बात करें, तो गरुड़ पुराण समेत कई अन्य पुराणों में इस बात का जिक्र मिलता है कि व्यक्ति कुछ विशेष परिस्थितियों में अपना श्राद्ध कर सकता है।
इस श्राद्ध को 'जीवित श्राद्ध' या 'आत्म श्राद्ध' कहा जाता है। वास्तव में यह एक बड़ा प्रश्न है कि आखिर कौन अपने जीवित रहते हुए खुद का श्राद्ध करता है?
दरअसल, यह श्राद्ध व्यक्ति तब कर सकता है जब वंशजों के रूप में कोई संतान मौजूद न हो। ऐसे में इस भय से कि उसकी मृत्यु के बाद श्राद्ध और तर्पण कौन करेगा? निःसंतान दंपति आत्म श्राद्ध जैसा कर्म कर सकते हैं।
इस परंपरा का उद्देश्य अपनी मृत्यु की तैयारी करना नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करना होता है कि मृत्यु के बाद उनकी आत्मा की शांति के लिए किए जाने वाले आवश्यक श्राद्ध कर्म किसी वजह से छूट ना जाए।
गरुड़ पुराण में लिखी है ये बात
गरुड़ पुराण के प्रेत कल्प में इस बारे में वर्णन मिलता है कि जीवित रहते हुए व्यक्ति किस तरह से आत्म श्राद्ध कर सकता है और उसके लिए कौन से नियम हैं।
इसमें लिखा है कि गरुड़ जी भगवान विष्णु से पूछते हैं कि क्या कोई व्यक्ति अपने जीवनकाल में स्वयं अपना श्राद्ध कर्म कर सकता है? तब भगवान विष्णु उत्तर देते हुए कहते हैं कि-'अपुत्रेणैव कतर्व्यं जीवच्छ्राद्धं स्वकं बुधैः।'
इसका अर्थ यह है कि- बुद्धिमान मनुष्य को, विशेषकर जिसके पुत्र या संतान न हो, उसे अपने जीवनकाल में ही स्वयं का जीवित श्राद्ध या आत्म श्राद्ध कर लेना चाहिए।
विष्णु जी कहते हैं कि जब कोई संतान न हो, तो मनुष्य को उपवास और स्नान करके एकाग्र मन से सर्वेश्वर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए और समय आने पर स्वयं के लिए 'आत्म-श्राद्ध' करना चाहिए। इससे मृत्यपरांत आत्मा को मोक्ष मिलता है और आत्मा इधर-उधर भटकती नहीं है।
आत्म श्राद्ध करने का एक गहरा अर्थ यह है कि व्यक्ति अपने धार्मिक कर्तव्यों को किसी दूसरे पर छोड़ने के बजाय अपने जीवनकाल में ही उन्हें पूरा करना चाहता है।
संन्यास ग्रहण करने वाले भी करते है 'आत्म श्राद्ध'
गृहस्थ जीवन जीने वालों के अलावा आत्म श्राद्ध आमतौर पर संन्यास ग्रहण करने से पूर्व लोग करते हैं। साधु संत और वैराग्य का मार्ग चुनने वाले साधकों के लिए यह परंपरा जिसे 'आत्मश्राद्ध' कहा जाता है, एक अनिवार्य चरण माना जाता है।
संन्यास धारण करने से पूर्व व्यक्ति मोह मनाया का त्याग तो करता ही है और इस बात को भी दिखाता है कि उसने आत्म श्राद्ध करके दुनिया के सभी कर्मों से मुक्ति पा ली है।
भविष्य में उनके वंशजों पर को ऋण नहीं होता है। जीवित श्राद्ध की इस परंपरा में संन्यास को पुराने जीवन के त्याग के रूप में देखा जाता है, इसलिए यह श्राद्ध पुराने जीवन को छोड़कर नए जीवन में प्रवेश करने का प्रतीक माना जाता है।
गरुड़ पुराण में लिखी कई बातों का अपना लग महत्व है। इन्हीं में से एक है आत्म श्राद्ध करना जिसे एक ऐसी प्रक्रिया माना जाता है जो वंशजों से मोह दूर करता है।
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