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    यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Apr 29, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

    Baglamukhi Jayanti 2025: शत्रुओं पर विजय दिलाती हैं मां बगलामुखी, जानिए कब है जयंती और क्या है इनका महत्व

    Updated: Tue, 29 Apr 2025 07:20 PM (IST)

    Baglamukhi Jayanti 2025 उदिया तिथि में अष्टमी तिथि (Baglamukhi Jayanti) की मान्यता होने की वजह से अष्टमी तिथि 5 मई को मनाई जाएगी और उसी दिन मां बगलामु ...और पढ़ें

    अष्टमी तिथि पर वृद्धि योग, रवि योग और सर्वार्थ शिववास योग रहेगा।
    अष्टमी तिथि पर वृद्धि योग, रवि योग और सर्वार्थ शिववास योग रहेगा।

    HighLights

    1. देश के कई राज्यों में इन्हें बुद्धि की देवी के नाम से जाना जाता है।
    2. कोर्ट-कचहरी के मुकदमों में जीत के लिए भी की जाती है साधना।
    3. मध्य प्रदेश में दो और हिमाचल प्रदेश में बना है माता का एक मंदिर।

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। दस महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या देवी बगलामुखी हैं। देवी पार्वती के उग्र स्वरूप के रूप में पूज्य बगलामुखी मां की जयंती (Baglamukhi Jayanti 2025) वैशाख शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। यह इस साल पांच मई को मनाई जाएगी।

    दरअसल, अष्टमी तिथि 4 मई को सुबह 7:18 मिनट पर लगेगी और अगले दिन 5 मई को सुबह 7:35 मिनट पर समाप्त होगी। उदिया तिथि में अष्टमी तिथि (Baglamukhi Jayanti) की मान्यता होने की वजह से अष्टमी तिथि 5 मई को मनाई जाएगी और उसी दिन मां बगलामुखी की पूजा और साधना की जाएगी।

    ये योग बन रहे हैं अष्टमी को

    इस दिन अष्टमी तिथि पर वृद्धि योग पूरी रात तक रहेगा। इसके इस तिथि पर रवि योग और सर्वार्थ शिववास योग भी बन रहा है। इन योगों में देवी मां बगलामुखी की पूजा करने से सुखों में वृद्धि होगी। मां बगलामुखी की पूजा मुख्यतः युद्ध में विजय, शत्रुओं को परास्त करने और कोर्ट-कचहरी के मामलों में जीत के लिए की जाती है।

    पांडवों ने भी की थी साधना

    इनकी साधना रात के समय में करने से विशेष सिद्धि मिलती है। कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने भी महाभारत के युद्ध से पहले पांडवों से मां बगलामुखी की साधना करवाई थी। देश में मां बगलामुखी के तीन प्रमुख ऐतिहासिक मंदिर हैं। इनमें से दो मंदिर मध्य प्रदेश के दतिया और नलखेड़ा-आगर मालवा में और एक हिमाचल के कांगड़ा में है।

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    पीले रंग का होता है प्रयोग

    देवी बगलामुखी का रंग सोने की तरह पीला है। इसीलिए उनकी पूजा करने के समय पीले कपड़े पहने जाते हैं और पीले रंग की ही अन्य सामग्रियों का भी इस्तेमाल किया जाता है। उनकी साधना से पहले हरिद्रा गणपति की पूजा और आह्वान किया जाता है।

    ब्रह्मा जी ने दिया था साधना का उपदेश

    पाैराणिक मान्यता के अनुसार, सबसे पहले सनकादि ऋषियों को ब्रह्माजी ने बगलामुखी साधना का उपदेश दिया था। उनसे प्रेरणा पाकर देव ऋषि नारद ने मां बगलामुखी की साधना की थी। देवी के दूसरे उपासक भगवान विष्णु ने भगवान परशुराम को यह विद्या सिखाई थी।

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    कालांतर में उन्होंने यह विद्या गुरु द्रोण को दी। कहते हैं महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों को युद्ध से पहले बगलामुखी की साधना करने के लिए कहा था। वैदिक काल में सप्तऋषियों ने देवी बगलामुखी की साधना की थी।

    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।