भगवत गीता के इन 3 उपदेशों से वैवाहिक जीवन में लाएं मिठास, दूर होंगे मनमुटाव
गीता के उपदेश वैवाहिक जीवन को सफल और प्रेमपूर्ण बनाने में सहायक हैं। कर्म, मन पर नियंत्रण और क्रोध प्रबंधन जैसे सिद्धांत रिश्ते को मजबूत करते हैं।

गीता के अनमोल उपदेशों से संवारें अपना वैवाहिक जीवन (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
कर्म करो फल की इच्छा मत करो का पालन करें।
अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखना सीखें।
क्रोध पर काबू पाकर रिश्ते को मजबूत बनाएं।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। गीता में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को कई ऐसे उपदेश दिए हैं जिनका पालन करने से जीवन को सफल और सकारात्मक बनाने में मदद मिलती है। अगर आपके वैवाहिक जीवन में किसी वजह से समस्याएं आने लगी हैं, तो आपको इन उपदेशों को ध्यान में रखना चाहिए और स्वयं में परिवर्तन लाने के बारे में सोचना चाहिए।
गीता के कुछ प्रमुख उपदेशों में से यहां कुछ के बारे में बताया जा रहा है। यदि आप इन उपदेशों के गूढ़ मंत्र को ध्यान में रखते हुए जीवन जीते हैं तो आपसी मतभेद कम होने के साथ वैवाहिक जीवन में प्रेम भी बढ़ेगा। यही नहीं ये सभी उपदेश आपके आम जीवन में भी सफलता के मूल मंत्र हैं। आइए जानें कौन से श्लोक और उपदेश आपके जीवन में प्रेम और खुशहाली ला सकते हैं।
कर्म करो फल की इच्छा मत करो
गीता का एक सबसे बड़ा उपदेश है कर्म करो फल की इच्छा मत करो। यह भगवद गीता के द्वितीय अध्याय के 47वें श्लोक में बताया गया है। श्री कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि आपको हमेशा हमेशा अपने कर्म के बारे में जहि सोचना चाहिए और फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। निश्चय ही फल आपके पक्ष में होगा।
जब हम सफल वैवाहिक जीवन की बात कर रहे हैं तो यह उपदेश आपके वैवाहिक जीवन के लिए भी अत्यंत लाभदायी होगा। इसका तात्पर्य यह हुआ कि व्यक्ति को वैवाहिक रिश्ते में भी निःस्वार्थ कर्म करना चाहिए जिससे आपका वैवाहिक रिश्ता अच्छा बना रहेगा। इस उपदेश के लिए गीता में यह श्लोक लिखा है-कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
मन ही मित्र है और मन ही शत्रु है
भगवद गीता के छठे अध्याय के छठे श्लोक में श्री कृष्ण ने इस श्लोक के बारे में बताया है।
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥
श्रीकृष्ण ने इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन को बताया था कि यदि मनुष्य अपने मन पर नियंत्रण रखता है तो वही उसका सबसे बड़ा मित्र बन जाता है। इसका तात्पर्य इद्रियों पर नियंत्रण रखने से भी है। ऐसे ही यदि आप वैवाहिक जीवन को सफल बनाना चाहते हैं तो आपके लिए मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना जरूरी है। यदि आपका मन नियंत्रण में नहीं है तो आपसी कलह-कलेश हो सकते हैं।

क्रोध पर नियंत्रण रखना जरूरी है
गीता में कृष्ण ने अर्जुन को यह उपदेश दिया था कि क्रोध पर नियंत्रण रखना जरूरी है। इससे जुड़ा श्लोक गीता के दूसरे अध्याय के 63 वे श्लोक के रूप में मिलता है।
क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम:।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
इस श्लोक का मतलब यह है कि क्रोध व्यक्ति के निर्णय लेने की क्षमता को कमजोर करता है जिसके कारण भ्रम की स्थिति बनती है। इससे बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश होने से मनुष्य का पतन होता है। यदि आप इस उपदेश को वैवाहिक जीवन से जोड़ें तो साफ है कि क्रोध से आपके रिश्ते खराब हो सकते हैं, इसलिए आपको हमेशा क्रोध पर नियंत्रण रखना चाहिए। यदि आपका जीवनसाथी क्रोध करे तो आपको उसको शांत करने की जरूरत है न कि खुद भी गुस्सा दिखाना चाहिए।
गीता के कई उपदेश हैं जिनमें सफल वैवाहिक जीवन का मंत्र मिलता है। आपको भी इन उपदेशों के अपने वैवाहिक जीवन में जरूर आजमाना चाहिए।
यह भी पढ़ें- कार्यस्थल पर नहीं मिल रही तरक्की? नियम से करें गीता के इस अध्याय का पाठ, जल्द मिलेगा रास्ता
यह भी पढ़ें- क्या आप भी हर छोटी बात पर करते हैं ओवरथिंक? गीता की इन 5 बातों से खुद को करें 'रीबूट'
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।
