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    Gangaur 2026: गणगौर पूजा में बस एक बार कर लें इस स्तोत्र का पाठ, वैवाहिक जीवन में कभी नहीं आएगी कड़वाहट

    Updated: Thu, 19 Mar 2026 04:03 PM (GMT+05:30)

    21 मार्च को गणगौर का महापर्व मनाया जाएगा। यह भगवान शिव और माता पार्वती के अटूट प्रेम का प्रतीक है। ...और पढ़ें

    Gangaur 2026: गणगौर पूजा।

    Gangaur 2026: गणगौर पूजा।

    HighLights

    1. गणगौर पूजा का हिंदू धर्म में बड़ा महत्व है

    2. इस दौरान शिव-पार्वती की पूजा होती है

    3. यह व्रत बहुत फलदायी माना जाता है

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। Chaitra Navratri 2026: चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि यानी 21 मार्च 2026 को गणगौर का महापर्व मनाया जाएगा। यह केवल एक व्रत नहीं, बल्कि भगवान शिव और माता पार्वती के अटूट प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए व्रत रखती हैं, वहीं कुंवारी कन्याएं मनचाहा वर पाने के लिए मां गौरी की विधिवत पूजा-अर्चना करती हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गणगौर के दिन मां गौरी के मंगला स्वरूप की पूजा की जाती है। कहते हैं कि इस दिन 'मंगला गौरी स्तोत्र' का पाठ करने से मांगलिक दोष का प्रभाव कम होता है और वैवाहिक जीवन के क्लेश समाप्त हो जाते हैं, तो आइए पढ़ते हैं -

    Mahashivratri 2026  aarti

    ॥मंगला गौरी स्तुति॥

    जय जय गिरिराज किसोरी।

    जय महेस मुख चंद चकोरी॥

    जय गजबदन षडानन माता।

    जगत जननि दामिनी दुति गाता॥

    देवी पूजि पद कमल तुम्हारे।

    सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥

    मोर मनोरथ जानहु नीकें।

    बसहु सदा उर पुर सबही के॥

    कीन्हेऊं प्रगट न कारन तेहिं।

    अस कहि चरन गहे बैदेहीं॥

    बिनय प्रेम बस भई भवानी।

    खसी माल मुरति मुसुकानि॥

    सादर सियं प्रसादु सर धरेऊ।

    बोली गौरी हरषु हियं भरेऊ॥

    सुनु सिय सत्य असीस हमारी।

    पूजिहि मन कामना तुम्हारी॥

    नारद बचन सदा सूचि साचा।

    सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा॥

    मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर सांवरो।

    करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥

    एही भांती गौरी असीस सुनी सिय सहित हियं हरषीं अली।

    तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥

    ।।लिंगाष्टकम स्तोत्र (Shiv Lingastakam Stotra)।।

    ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं निर्मलभासितशोभितलिङ्गम् ।

    जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥१॥

    देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गं कामदहं करुणाकरलिङ्गम् ।

    रावणदर्पविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥२॥

    सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गं बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम् ।

    सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥३॥

    कनकमहामणिभूषितलिङ्गं फणिपतिवेष्टितशोभितलिङ्गम् ।

    दक्षसुयज्ञविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥४॥

    कुङ्कुमचन्दनलेपितलिङ्गं पङ्कजहारसुशोभितलिङ्गम् ।

    सञ्चितपापविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥५॥

    देवगणार्चितसेवितलिङ्गं भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम् ।

    दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥६॥

    अष्टदलोपरिवेष्टितलिङ्गं सर्वसमुद्भवकारणलिङ्गम् ।

    अष्टदरिद्रविनाशितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥७॥

    सुरगुरुसुरवरपूजितलिङ्गं सुरवनपुष्पसदार्चितलिङ्गम् ।

    परात्परं परमात्मकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥८॥

    लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ।

    शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

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