Gangaur 2026: कब है गणगौर और क्यों की जाती है देवी गौरी की पूजा? जानें तिथि और पूजा विधि
Gangaur 2026: साल 2026 में गणगौर का व्रत कब है? जानें शुभ मुहूर्त से लेकर पूजा विधि और सुहागिन महिलाओं के लिए इस महापर्व का महत्व। ...और पढ़ें

Gangaur 2026: गणगौर व्रत 2026 (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू पंचांग के अनुसार, गणगौर (Gangaur Vrat 2026) का मुख्य पर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। ग्रेगोरियन कैलेंडर (अंग्रेजी कैलेंडर) के हिसाब से साल 2026 में यह तिथि 21 मार्च, शनिवार को पड़ रही है।
वैसे तो होली के अगले दिन (धुलंडी) से ही 16 दिनों तक चलने वाले इस व्रत की शुरुआत हो जाती है। लेकिन, चैत्र शुक्ल तृतीया का दिन सबसे खास होता है क्योंकि इसी दिन इस पर्व का समापन और विसर्जन किया जाता है।
द्रिक पंचांग के मुताबिक, चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 21 मार्च 2026 को 02 बजकर 30 मिनट पर शुरू हो रही है। इस तिथि का समापन इसी दिन रात में 11 बजकर 56 मिनट पर हो जाएगा। ऐसे में 21 मार्च, शनिवार को गणगौर व्रत रखा जाएगा।
गणगौर पूजा 2026: शुभ समय (Muhurat)
सूर्योदय (Sunrise): सुबह 06:24 बजे।
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:49 से सुबह 05:36 तक। (यह समय पूजा की तैयारी और ध्यान के लिए उत्तम माना जाता है)।
अभिजित मुहूर्त: दोपहर 12:04 से दोपहर 12:52 तक। (किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने के लिए यह सबसे श्रेष्ठ समय है)।
संध्या मुहूर्त: शाम 06:32 से शाम 07:43 तक। (शाम की आरती और पूजा के समापन के लिए यह मुहूर्त शुभ रहेगा)।
क्या है गणगौर पूजा का महत्व?
'गणगौर' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है- 'गण' यानी भगवान शिव (Lord Shiva) और 'गौर' यानी माता पार्वती। यह त्योहार सीधे तौर पर पति-पत्नी के प्रेम और समर्पण को दर्शाता है।

(Image Source: AI-Generated)
किसे करना चाहिए यह व्रत
सुहागिन महिलाएं: अपने पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए यह व्रत रखती हैं।
कुंवारी कन्याएं: अच्छे और मनचाहे जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए शिव-गौरी की उपासना करती हैं।
पूजा की विधि और परंपरा
गणगौर की पूजा की परंपराएं :
मिट्टी के ईसर-गौरी: भक्त अपने हाथों से पवित्र मिट्टी (अक्सर तालाब या कुएं की मिट्टी) से शिव-पार्वती (ईसर-गणगौर) की मूर्तियां बनाते हैं। उन्हें सुंदर कपड़े और गहने पहनाए जाते हैं।
16 दिनों का नियम: होली के अगले दिन से महिलाएं रोज सुबह जल्दी उठकर दूब और फूल लेकर आती हैं और गीत गाते हुए पूजा करती हैं।
सोलह श्रृंगार और लोकगीत: पूजा के दौरान महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं और 'गोर ए गणगौर माता...' जैसे पारंपरिक लोकगीत गाती हैं, जिससे घर-आंगन गूंज उठता है।
विसर्जन: अंतिम दिन यानी 21 मार्च को महिलाएं इन मूर्तियों को किसी नदी, तालाब या सरोवर में पूरे मान-सम्मान के साथ विसर्जित करती हैं।
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