एक श्राप के कारण वानरी बनी थीं माता अंजना, बेहद दिलचस्प है हनुमान जी के जन्म का रहस्य
हनुमान जी का जन्म केवल एक दिव्य बालक का आगमन नहीं था, बल्कि अंजना के श्राप, तपस्या और भगवान शिव ...और पढ़ें

मां अंजनी का श्राप और हनुमान जी के जन्म से जुड़ी कथा (Picture Credits- AI Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हनुमान जी का जन्म मात्र एक दिव्य बालक के आगमन की ही कहानी नहीं है। इसके पीछे एक मां का दर्द, शक्तिशाली श्राप, बारह सालों की गहरी तपस्या और एक दिव्य योजना छिपी है जिसमें दो बिल्कुल अलग-अलग कहानियां आपस में जुड़ी है। पारंपरिक कथाओं के मुताबिक, अंजना एक समय पुंजिकास्थला नाम की अप्सरा थीं, जो एक ऋषि के श्राप के कारण धरती पर वारन रूप में जन्मीं थी।
उस श्राप से उनकी मुक्ति भगवान शिव के दिव्य अवतार को जन्म देने से जुड़ी थी। लेकिन यह सब असल में कब और कैसे हुआ? इसका जवाब हनुमान जी के जन्म को हिंदू पौराणिक कथाओं की सबसे रोचक कहानियों में गिना जाता है।
अंजना एक अप्सरा थी
हिंदू धर्म के अनुसार, अंजना को पुंजिकास्थला के नाम से जाना जाता था, जो देवराज इंद्र के दरबार में सबसे सुंदर अप्सराओं में शामिल थीं। लेकिन एक ऋषि के कारण उनका पूरा जीवन बदल गया। श्राप की वजह से उन्हें स्वर्ग लोक छोड़कर पृथ्वी पर वानर रूप में जन्म लेना पड़ा।
लेकिन श्राप के साथ एक छिपी हुई शर्त भी थी कि, एक दिव्य बालक को जन्म देने के बाद वे इस श्राप से मुक्त हो जाएंगी। यह बालक भगवान शिव से संबंधित होगा। इस तरह जो एक सजा की तरह दिखाई दे रहा था, वह धीरे-धीरे हनुमान जी के जन्म से जुड़ी एक महान और दिव्य कथा का हिस्सा बन गया।
अंजना ने केसरी से रचाई शादी
पृथ्वी पर जन्म लेने के बाद अंजना का विवाह केसरी से हुआ। उनका जीवन काफी शांति भरा प्रतीत होता था, लेकिन एक गहरा दुख फिर भी बन रहा। उनकी कोई संतान नहीं थी। देवी अंजनी के लिए यह पीड़ा और भी ज्यादा थी क्योंकि उन्हें पता था कि, प्राचीन श्राप से मुक्ति के लिए एक दिव्य पुत्र का जन्म लेना जरूरी है। हार मानने के बजाय उन्होंने आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त करने का निश्चय किया। वह महान ऋषि मतंग के पास गईं और उन्हें अपना दुख बताया। ऋषि ने उन्हें तपस्या करने की सलाह दी। ऋषि के मार्गदर्शन से आखिर में उन्हें वह आशीर्वाद प्राप्त हुआ जिसकी उन्हें प्रतीक्षा थी। 12 सालों की कठिन तपस्या के बाद भगवान शिव ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर दर्शन दिए। अंजना ने एक ऐसे दिव्य बालक की प्रार्थना की जो उन्हें पूर्व जन्म के श्राप से मुक्ति दिला सकें। भगवान शिव ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।
भगवान शिव के आशीर्वाद से अंजना देवी को एक दिव्य बालक की प्राप्ति हुई। लेकिन यह कहानी शिव के आशीर्वाद पर ही खत्म नहीं होती है। उसी समय अयोध्या में एक ओर महत्वपूर्ण घटना घट रही थी। राजा दशरथ पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ कर रहे थे क्योंकि वे पुत्रों की कामना कर रहे थे। पवित्र अनुष्ठान के आखिर में अग्नि देवता प्रकट हुए और उन्हें दिव्य खीर से भरा पात्र दिया। दशरथ ने उसे अपनी रानियों में बांट दिया।
एक कथा के अनुसार, एक पक्षी पवित्र खीर का एक अंश उड़ाकर अंजना के हाथों में गिरा दिया, जब वह तपस्या कर रही थीं। अंजना को लगा यह अंश उन्हें दैवीय कृपा से प्राप्त हुई है। उन्होंने इस प्रसाद को ग्रहण किया। यही पल कथा का सबसे निर्णायक मोड़ साबित हुआ। दशरथ के पवित्र यज्ञ की खीर, अंजना की तपस्या और भगवान शिव का आशीर्वाद एक साथ जुड़ गए और जल्द ही अंजना को एक ऐसे बालक की माता बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जो आगे चलकर प्रभु श्रीराम का सबसे बड़ा भक्त बना।
अंजना ने हनुमान जी को जन्म दिया, जिन्हें अनेक हिंदू परंपराओं में भगवान शिव से जुड़ा दिव्य अवतार माना जाता है। उनका जन्म सामान्य जन्म नहीं था। यह भक्ति, दैवीय कृपा और एक मां के लंबे संघर्ष का परिणाम था। हनुमान जी आगे चलकर ताकत, भक्ति, हिम्मत, समझदारी और विनम्रता के प्रतीक बने। अंजना के सबसे खास बात यह थी कि, उनके जन्म से उस पुराने श्राप से जुड़ी शर्त पूरी हो गई।
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