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    नीम चबाना और घर का खाना न खाना: श्मशान से लौटने के बाद के 4 कड़े नियम, जिनका जिक्र गरुड़ पुराण में भी है

    Updated: Thu, 16 Jul 2026 06:30 AM (IST)

    हिंदू धर्म में श्मशान घाट से लौटने के बाद नीम चबाने, स्नान करने और घर का बना भोजन न खाने जैसी परंपराओं का गहरा आध्यात्मिक महत्व है। ...और पढ़ें

    श्मशान घाट से लौटने के बाद 4 जरूरी नियम कौन-से हैं? (Picture Credits- AI Image)

    श्मशान घाट से लौटने के बाद 4 जरूरी नियम कौन-से हैं? (Picture Credits- AI Image)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि, हिंदू धर्म को मानने वाले लोग श्मशान घाट से लौटने के बाद घर में प्रवेश करने से पहले नीम की पत्तियां या कोई कड़वी चीज क्यों चबाते हैं? घर का बना भोजन क्यों नहीं खाते हैं? और परिवार के सदस्य मृतक के सिर्फ अच्छे गुणों की ही क्यों बात करते हैं?

    हिंदू धर्म में ये रीति रिवाज सिर्फ संयोगवश नहीं है। गरुड़ पुराण के मुताबिक, प्रत्येक अनुष्ठान का संबंध जीवन, मृत्यु, शुद्धि और आत्मा की अंतिम यात्रा से जुड़ा एक गहरा आध्यात्मिक मतलब है।

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    मृत्यु के बाद पहला काम शुद्धिकरण

    गरुड़ पुराण के अनुसार, श्मशान घाट से लौटने वालों को घर में प्रवेश करने से पहले स्नान करना चाहिए और उसके बाद दिवंगत आत्मा को तिलंजलि देना चाहिए। हिंदू धर्म में जल पंचतत्वों में शामिल है, जो शुद्धिकरण का प्रतीक भी माना जाता है।

    ऐसा माना जाता है कि, यह अनुष्ठान परिवार के परिजनों को मृत्यु से जुड़े दुख और अपवित्रता को पीछे छोड़ने में मदद करता है। इसके साथ ही दिवंगत आत्मा की शांतिपूर्ण यात्रा के लिए प्रार्थना का भी माध्यम है।

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    नीम चबाने की परंपरा

    अंतिम संस्कार के बाद जब लोग वापस घर को लौटते हैं, तो घर के अंदर जाने से पहले नीम की पत्तियों को चबाते हैं। आध्यात्मिक रूप से देखा जाए, तो नीम उस कड़वी सच्चाई का प्रतीक है कि, प्रत्येक इंसान को एक न एक दिन मौत आनी ही है। यह शोक मानने वालों को जीवन की असलियत को विनम्रता से स्वीकार करने में मदद करता है।

    अपने प्रतीकात्मक अर्थ के अलावा नीम को आयुर्वेद में शुद्धिकरण गुणों के लिए भी जाना जाता है। हालांकि अंतिम संस्कार की यह रस्म मुख्य रूप से काफी आध्यात्मिक महत्व रखती है।

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    संस्कार क्रिया के बाद दिवंगत की अच्छाई

    अंत्येष्टि क्रिया के बाद एक आम परंपरा यह भी है कि, मृतक के सिर्फ अच्छे गुण ही याद किए जाते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, आलोचना या वाद-विवाद के बजाय सकारात्मक यादों को ही प्रोत्साहित दिया जाता है।

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    यह प्रथा मरने वाले व्यक्ति के जीवन का सम्मान करती है। यह प्रथा इस विश्वास को दर्शाती है कि, आत्मा की अंतिम विदाई में करुणा और सम्मान का भाव ही होना चाहिए।

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    घर का बना खाना क्यों नहीं खाते हैं?

    हिंदू धर्म की पारंपरिक परंपराओं के मुताबिक, परिवार के किसी भी सदस्य की मृत्यु के दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता है। इसके बजाय रिश्तेदारों, पड़ोसी या मित्र द्वारा भोजन की व्यवस्था की जाती है।

    यह प्रथा शोक संत्पत लोगों को रोजाना की जिम्मेदारियों के बजाय प्रार्थना और अंतिम संस्कार पर ध्यान केंद्रित करने का मौका प्रदान करती है। यह समय दुख की घड़ी में सामुदायिक सहयोग को भी दर्शाता है और सभी को याद स्मरण कराती है कि, दुख का सामना कभी भी अकेले नहीं करना चाहिए।

    गरुड़ पुराण के अनुसार, प्रत्येक अंत्येष्टि अनुष्ठान शोक से परे एक संदेश देता है। नीम जीवन की क्षणभंगुरता (थोड़े समय बाद नष्ट हो जाने वाला) को स्वीकार करना सिखाता है। स्नान शुद्धिकरण का प्रतीक है।

    सामूहिक भोजन करुणा का प्रतीक और मधुर वाणी दिवंगत आत्माओं का सम्मान करना है। ये सभी परंपराएं हमें याद दिलाती हैं कि, यद्यपि मृत्यु को टाला नहीं जा सकता है।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।