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    सृष्टि रचना के दिन से शुरू होगा हिंदू नववर्ष; जानें क्यों खास है इस बार का 13 महीनों वाला साल

    Updated: Wed, 18 Mar 2026 08:25 PM (GMT+05:30)

    19 मार्च 2026 से विक्रम संवत् 2083 का भव्य शुभारंभ हो रहा है, जो सृष्टि रचना का दिन भी है। इस बार का हिंदू नववर्ष 'रौद्र संवत्सर' के प्रभाव में रहेगा, ...और पढ़ें

    फाइल फोटो।

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    HighLights

    1. 19 मार्च 2026 से विक्रम संवत् 2083 का शुभारंभ।

    2. 'रौद्र संवत्सर' के साथ 13 महीनों का दुर्लभ संयोग।

    3. गुरु राजा, मंगल मंत्री; बड़े बदलावों के संकेत।

    जागरण संवाददाता, जमशेदपुर। भारतीय संस्कृति और काल गणना के अनुसार, 19 मार्च 2026 से हिंदू नववर्ष विक्रम संवत् 2083 का भव्य शुभारंभ हो रहा है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की यह पावन तिथि न केवल एक नए साल की शुरुआत है, बल्कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। 
     
    इस बार का नववर्ष कई मायनों में विशेष और ज्योतिषीय दृष्टि से 'उग्र' संकेतों वाला माना जा रहा है। प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित नितेश कुमार मिश्रा के अनुसार, हिंदू पंचांग के 60 संवत्सरों के चक्र में इस बार 54वां संवत्सर ‘रौद्र’ प्रभावी होगा। 
     

    'रौद्र संवत्सर': 60 वर्षों बाद पुनरावृत्ति 

    दिलचस्प बात यह है कि इससे पूर्व यह संवत्सर वर्ष 1966 में आया था। जैसा कि नाम से स्पष्ट है कि रौद्र का सीधा संबंध भगवान शिव के उग्र स्वरूप से है। 
     
    ज्योतिषीय गणना बताती है कि यह वर्ष वैश्विक स्तर पर बड़े बदलावों, सत्ता परिवर्तन और प्राकृतिक हलचलों का साक्षी बन सकता है।

     

    ग्रहों का मंत्रिमंडल: गुरु होंगे 'राजा' और मंगल 'मंत्री'

    संवत् 2083 के ग्रहों के मंत्रिमंडल में इस बार देवगुरु बृहस्पति (गुरु) राजा के सिंहासन पर विराजमान होंगे, जबकि मंगल को मंत्री का पद प्राप्त होगा। 

    •     राजा गुरु: धर्म, ज्ञान, शिक्षा और आध्यात्मिकता में वृद्धि करेंगे। शासन व्यवस्था में न्यायप्रियता लाने का प्रयास होगा।
    •     मंत्री मंगल: साहस, ऊर्जा और त्वरित निर्णय का कारक बनेंगे।


    गुरु और मंगल का यह संयोग जहां एक ओर विकास की गति को तेज करेगा, वहीं दूसरी ओर कूटनीतिक असंतुलन और सीमावर्ती तनाव जैसी स्थितियां भी उत्पन्न कर सकता है।

     

    12 नहीं, इस बार होंगे 13 महीने

    पंडित मिश्रा ने बताया कि इस वर्ष एक दुर्लभ संयोग बन रहा है। गणना के अनुसार, इस साल 12 के स्थान पर 13 महीने होंगे। ज्येष्ठ मास में 'अधिक मास' (मलमास) पड़ने के कारण ज्येष्ठ का महीना दो बार आएगा। 
     
    सनातन परंपरा में इसे 'पुरुषोत्तम मास' कहा जाता है। भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए यह समय जप, तप और दान के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। 'रौद्र संवत्सर' के प्रभाव स्वरूप पृथ्वी संबंधी हलचलों जैसे भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट या बेमौसम भारी वर्षा की संभावनाएं प्रबल हैं। 
     
    राजनीतिक गलियारों में भी उथल-पुथल देखी जा सकती है। ज्योतिषाचार्य के अनुसार, ऐसे समय में समाज के लिए धैर्य, संयम और आध्यात्मिक शक्ति ही संतुलन बनाए रखने का एकमात्र मार्ग है।

     

    भक्तिमय होगा वातावरण 

    19 मार्च से ही चैत्र नवरात्र का भी आरंभ हो रहा है। इस दिन श्रद्धालु अपने घरों पर धर्म ध्वजा (भगवा झंडा) फहराएंगे और दीप प्रज्वलित कर नववर्ष का अभिनंदन करेंगे। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की तैयारियां अभी से शुरू हो गई हैं।

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