देवताओं में सबसे पूज्य कैसे बने देवगुरु बृहस्पति? जानें महादेव के वरदान की कथा
देवगुरु बृहस्पति को देवताओं का गुरु और नवग्रहों में सबसे शुभ ग्रह माना जाता है। जानिए कैसे भगवान शिव के वरदान से उन्हें देवताओं में पूज्य स्थान मिला। ...और पढ़ें

बृहस्पति देव को कैसे मिला महादेव का वरदान? (AI-Generated Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय ज्योतिष में देवगुरु बृहस्पति को बेहद अहम स्थान मिला है। उन्हें सिर्फ देवताओं का गुरु ही नहीं, बल्कि ज्ञान, धर्म, बुद्धि और समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, भगवान शिव के वरदान से गुरुदेव को देवताओं में सबसे पूज्य बनने का गौरव प्राप्त हुआ था। यही कारण है कि नवग्रहों में भी गुरु ग्रह को सबसे शुभ ग्रह माना गया है।
ज्योतिष शास्त्र में गुरु ग्रह को सुख, समृद्धि, शिक्षा, विवाह, संतान और धार्मिक कार्यों का कारक माना गया है। कहा जाता है कि जिस व्यक्ति की कुंडली में गुरु मजबूत होता है, उसके जीवन में सम्मान, सफलता और ज्ञान की कभी भी कोई कमी नहीं होती। लेकिन, इसके उलट अगर गुरु कमजोर है तो जीवन में कई तरह की परेशानियां आने की संभावनाएं बढ़ने लगती हैं।
ये हैं गुरुदेव के तेजस्वी नाम
शास्त्रों में बृहस्पति को सुराचार्य, देवाचार्य और वाचस्पति जैसे कई तेजस्वी नामों से संबोधित किया गया है। इसके अलावा, शिव पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार, गुरु देव ने कठोर तपस्या की थी जिसके बाद देवों के देव महादेव यानी भगवान शिव उनकी साधना से अत्यंत प्रसन्न हुए थे। उनकी भक्ति और ज्ञान से खुश होने के बाद ही भोलेनाथ ने उन्हें देवताओं का गुरु बनने का आशीर्वाद दिया। तभी से वे देवताओं के मार्गदर्शक और धर्म के रक्षक माने जाते हैं।

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क्या कहती है सनातन परंपरा?
सनातन परंपरा में किसी भी शुभ कार्य से पहले गुरु ग्रह की स्थिति जरूर देखी जाती है। जब देवगुरु बृहस्पति उदित अवस्था में होते हैं, तब विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य मांगलिक कार्य किए जाते हैं। लेकिन जब गुरु अस्त हो जाते हैं, तब शुभ कार्यों को रोक दिया जाता है। मान्यता है कि उस समय उनकी शुभ ऊर्जा कमजोर हो जाती है। इसी वजह से देवगुरु बृहस्पति को देवताओं में सबसे पूज्य और कल्याणकारी ग्रह माना जाता है।
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बृहस्पतिवार की पूजा का महत्व
ज्योतिषीय मान्यताओं में बृहस्पति को विस्तार, ज्ञान और व्यापकता का प्रतीक माना गया है। इसलिए, गुरुवार यानी बृहस्पतिवार के दिन पूजा करने के लिए सुबह जल्दी उठ जाना चाहिए फिर बृहस्पति देव का पूजा करनी चाहिए। इस दिन पीली वस्तुएं, पीले फूल, चने की दाल, मुनक्का, पीली मिठाई, पीले चावल और हल्दी अर्पित करने का विधान है। इसके बाद केले के पेड़ की पूजा का भी बड़ा महत्व है। कहते हैं सच्चे मन के साथ अपनी मनोकामना बृहस्पतिदेव के आगे कहने से और सच्चे दिल से पूजा करने से भगवान जरूर प्रसन्न होते हैं।
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