देवी पार्वती को अपना निवाला बनाने आया शेर कैसे बना मां दुर्गा की सवारी?
श्रीमद् देवीभागवत पुराण में वर्णन है कैसे एक भूखा शेर मां दुर्गा का वाहन बना। पढ़ें देवी पार्वती की तपस्या, उनके गोरे होने और शेर के धैर्य की पौराणिक कथा।

देवी दुर्गा के दिव्य वाहन शेर से जुड़ी पौराणिक कथा

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में मां दुर्गा को दिव्य शक्ति और ऊर्जा की सर्वोच्च देवी के रूप में पूजा जाता है। देवी दुर्गा को जगत जननी, आदि शक्ति और ब्रह्मांड की माता माना जाता है, जो बुराई और अज्ञान को खत्म कर धर्म की रक्षा करती हैं।
भारत में मां दुर्गा के कई मंदिर हैं, जहां मां की पूजा होती है। वही मां दुर्गा का दिव्य वाहन शेर जिसपर माता सवार होती है। कभी सोचा है कि आखिर ये भूखे शेर मां दुर्गा के वाहन कैसे बनें? आइए जानते हैं इसके पीछे की पौराणिक कथा।
भूखे शेर कैसे बने मां दुर्गा के वाहन?
महर्षि व्यास द्वारा रचित अनेक पुराणों से एक पुराण 'श्रीमद् देवीभागवत पुराण' जो मां दुर्गा की उत्पत्ति और उनके कर्तव्यों को समर्पित है। शक्तिशाली शेर का मां दुर्गा का वाहन बनने की पौराणिक कहानी तब शुरू होती है, जब देवी पार्वती घोर तपस्या करके भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने का प्रयास कर रही थी।
कई सालों की कठिन तपस्या के बाद भगवान भोलेनाथ माता पार्वती को पत्नी के रूप में अपना लेते हैं। इस बीच तपस्या के प्रभाव से मां पार्वती का रंग काफी काला पड़ जाता था। एक दिन ऐसे ही बातचीत के दौरान भगवान शिव माता पार्वती को काली कह देते हैं, ये बात उन्हें अच्छी नहीं लगी, तब मां पार्वती नाराज होकर फिर से तपस्या करने चली जाती है।

भगवान शिव का दिव्य आशीर्वाद
पौराणिक कथाओं के मुताबिक, माता पार्वती जब तपस्या कर रही थी, उसी वक्त वहां एक शेर घूमते-घूमते आ जाता है, माता को खाने की इच्छा रखने वाला शेर माता का तप पूरा होने का इंतजार करता है। समय बीतता जाता है और शेर तप समाप्त होने का इंतजार करता है। जब सालों बीत जाते हैं शेर को देवी का इंतजार करते-करते तब वह देवी को खाने की इच्छा लेकर उनके पास जाता है लेकिन उनके तप के तेज की वजह से वह पीछे हट जाता है। कई बार कोशिशों के बाद भी शेर माता के नजदीक नहीं आता और कोने में बैठ जाता है। माता पार्वती की कठिन तपस्या से खुश होकर भगवान शिव प्रकट होते हैं और वर मांगने को कहते हैं।
माता पार्वती कहती है कि, मुझे पहले की तरह गोरा रंग वापस पाना है। भगवान शिव उनकी इच्छा को पूर्ण करते हैं। आशीर्वाद मिलते ही मां पार्वती नहाने चली जाती है और उनके नहाते ही उनके शरीर से एक अन्य देवी का जन्म होता है, जिनका नाम कौशिकी पड़ता है। नहाते समय उनके शरीर से काला रंग निकल जाता है और माता पार्वती का रंग पहले की ही तरह साफ हो जाता है। इसी कारण से माता पार्वती को मां गौरी के नाम से भी पुकारा जाता है। जब माता पार्वती की नजर शेर पर पड़ती है, जो उन्हें खाने का इंतजार करते हुए एक कोने में बैठा था।
माता पार्वती भगवान शिव के पास जाती है और उनसे वरदान मांगती है कि, हे नाथ ये शेर सालों से मुझे भोजन के रूप में खाने के लिए इंतजार कर रहा था, जितना तप मैंने किया है, उतना ही तप इसने भी मेरे साथ किया है। इसी कारण से आप इस शेर को वरदान के रूप में मेरी सवारी बना दीजिए। भगवान शिव ने माता पार्वती की इस बात से खुश होकर शेर को उनकी सवारी बना दी। आशीर्वाद मिलने के साथ ही माता शेर पर सवार हो गई और तभी से उनका नाम मां शेरावली और मां दुर्गा पड़ गया।
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