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    श्रीराम से पहले इक्ष्वाकु वंश के किस राजकुमार को मिला था वनवास, जानें पूरी कथा

    Updated: Sun, 14 Jun 2026 07:00 AM (IST)

    हममें से ज्यादातर लोगों को यही लगता है कि, भगवान श्रीराम पहले ऐसे राजकुमार थे, जिन्हें वनवास जाना पड़ा था, लेकिन इक्ष्वाकु वंश से जुड़े एक अन्य राजकुम ...और पढ़ें

    राम जी से पहले किसे मिला था वनवास? (AI-Generated Image)

    राम जी से पहले किसे मिला था वनवास? (AI-Generated Image)

    HighLights

    1. कैकेयी ने श्रीराम के वनवास को असमंजस के निष्कासन से जोड़ा।

    2. क्रूर राजकुमार असमंजस को प्रजा के हित में दंडित किया गया।

    3. श्रीराम का वनगमन पिता की आज्ञा का पालन और त्याग था।

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हममें से ज्यादातर लोगों को यही लगता है कि, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जो इक्ष्वाकु वंश के पहले ऐसे राजकुमार थे, जिन्हें वनवास भुगतना पड़ा, लेकिन वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड के अनुसार भगवान श्रीराम से पहले भी एक राजकुमार जिन्होंने वनवास का सामना किया था।

    जब महाराजा दशरथ पुत्र मोह और ग्लानि के गहरे सागर में डूब रहे थे, तब माता कैकेयी ने उनके घावों पर मरहम लगाने के बजाय व्यंग्य की बौछार कर दी। उन्होंने राजा दशरथ को सांत्वना देते हुए कहा कि,

    हे राजन! आप इस तरह व्याकुल क्यों हो रहे हैं? ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है कि, किसी पिता ने अपने पुत्र को राज्य से निकाला हो और वनवास के लिए भेजा हो। आपके ही इक्ष्वाकु वंश के पूर्वज महाराज सागर ने भी तो अपने बड़े पुत्र असमंजस को राज्य से निर्वासित किया था। फिर राम के जाने पर इतना विलाप क्यों कर रहे हैं?

    माता कैकेयी के इस असंगत तर्क को सुनकर सभा में खड़े सभी मंत्रीगण सन्न रह गए। महाराज दशरथ के अत्यंत वृद्ध, बुद्धिमान और प्रिय मंत्री सिद्धार्थ से यह धर्म सहन नहीं हुआ। उन्होंने भरी सभा में कैकेयी को टोकते हुए इस तुलना का कड़ा विरोध किया। सिद्धार्थ ने कहा कि, आप एक परम धार्मिक, मर्याद पुरुष की तुलना दुष्ट व्यक्ति से कैसे कर सकती हैं?

    वृद्ध मंत्री ने सुनाई महाराज सागर और असमंजस की कथा

    वृद्ध मंत्री ने सभा में उपस्थित सभी लोगों को कथा सुनाते कहा कि, महाराज सागर का बड़ा पुत्र असमंजस काफी क्रूर और विकृत मानसिकता का व्यक्ति था। वह सिर्फ अपने मनोरंजन के लिए छोटे-छोटे मासूम बच्चों को उठाकर उफनती हुई सरयू नदी में फेंद दिया करता था।

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    डूबते हुए बच्चों को देखकर प्रसन्न होना, जब वे बच्चे पानी में डूबते और तड़पते थे, तो असमंजस उन्हें देखकर ठहाके लगाता था और खुश होता था। जब पानी सिर के ऊपर चला गया, तो चिंतित प्रजा महाराज सागर के पास पहुंची। रोती-बिलखती प्रजा को देखकर राजा के समक्ष धर्म संकट खड़ा हो गया। प्रजा ने रोते हुए महाराज से कहा, या तो आज आप अपने इस दुष्ट पुत्र को चुन लीजिए या अपनी प्रजा को।

    राजा सागर ने निभाया क्षत्रिय धर्म

    महाराज सागर ने जब प्रजा के दुख का असल कारण जाना, तो वे गहरे धर्मसंकट में पड़ गए। लेकिन एक सच्चे राजा का कर्तव्य निभाते हुए उन्होंने वही किया जो एक क्षत्रिय करता है। उन्होंने अपनी प्रजा की रक्षा के लिए उसी पल अपने सगे ज्येष्ठ पुत्र असमंजस को राज्य से निष्कासित कर दिया। और उसे वन में वास करने के लिए छोड़ दिया।

    रामायण

    (AI-Generated Image)

    मंत्री सिद्धार्थ ने कैकेयी को दिखाया आईना

    असमंजस को उसके जघन्य अपराधों, क्रूरता और प्रजा-दोष के कारण दंड स्वरूप राज्य निकाला का आदेश दिया गया था। लेकिन श्रीराम ने ऐसा कौन-सा अपराध किया है? राम प्रजा के प्राण और धर्म के साक्षात स्वरूप हैं। एक पापी के निष्कासन और धर्मात्मा के वनवास की तुलना असमंजस से करना सरासर गलत है।

    वाल्मीकि रामायण का यह प्रसंग हमें सिखाता है कि, दंड और त्याग में क्या अंतर होता है। असमंजस का निकाला जाना दंड था, जबकि श्रीराम का वन गमन पिता की आज्ञा और त्याग का प्रतीक था। कैकेयी का यह कुतर्क सिर्फ उनकी राजनीतिक कुटिलता तक ही सीमित रहा, जिसे इतिहास ने कभी स्वीकार नहीं किया।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।