भगवान की आरती करते वक्त उसे घड़ी की दिशा में गोल-गोल क्यों घुमाया जाता है?
हिंदू पूजा में आरती को घड़ी की दिशा यानी दक्षिणावर्त में घुमाने की परंपरा है। जानिए इसके पीछे का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व। दक्षिणावर्त दिशा को शुभ औ ...और पढ़ें

आरती में दक्षिणावर्त दिशा का महत्व। (Picture Credit- AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भगवान की आरती करते वक्त हमारे हाथ ऑटोमैटिकली घड़ी की दिशा में गोल-गोल घूमना शुरू हो जाते हैं। ऐसा क्यों होता है? हम इसकी विपरीत दिशा में क्यों नहीं अपने हाथों को घुमाते ? क्या यह सारे प्रश्न आपके मन में भी आते हैं? यदि हां, तो आपको बता दें कि हिंदू धर्म में दक्षिणावर्त दिशा का महत्व बताया गया है। स्कंद पुराण के केदारखंड के अध्याय 17 के श्लोक 112-116 में इस बात को बहुत ही खूबसूरती से बताया गया है ।
स्कंद पुराण का श्लोक
दक्षिणावर्त प्रदक्षिणं सर्वकार्येषु सर्वदा:
दक्षिणे सर्वसिद्धि: स्यात:
वामे विघ्नः प्रजायते: ।
इस श्लोक का अर्थ है कि सभी कार्यों में और हमेशा दाईं ओर से ही परिक्रमा करनी चाहिए। दाईं ओर से परिक्रमा करने से सारे काम सफल होते हैं और जो मन में होता है, वह मिल जाता है। बाईं ओर से परिक्रमा करने से काम में रुकावटें आती हैं।
अर्थात भगवान को दीपक अर्पित करना और फिर उसे गोल-गोल घुमाना भी एक तरह से परिक्रमा ही है। स्कंद पुराण के अनुसार, आरती करने के लिए सबसे पहले भगवान के चरणों के पास दीपक को 4 बार घुमाएं। इसके बाद भगवान की नाभि के पास 2 बार घुमाएं। फिर मुखमंडल के पास 1 बार घुमाएं और अंत में संपूर्ण शरीर के आगे 7 बार दीपक घुमाएं। हर बार दक्षिणावर्त दिशा में ही आरती को घुमाएं। कालचक्र यानी घड़ी की दिशा भी यही होती है, इसलिए कहा जाता है कि भगवान की आरती हमेशा घड़ी की दिशा में गोल-गोल करनी चाहिए।
दक्षिणावर्त आरती के लाभ
- यदि आप दक्षिणावर्त दिशा में भगवान की आरती करते हैं, तो आपके अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है।
- इस तरह से आरती करने से आप जिस भी देवता को मानते हैं उनकी सम्मानपूर्वक परिक्रमा भी हो जाती है।
- यह दिशा सूर्य, ग्रहों और कालचक्र की गति के समान है, जिसे धार्मिक शास्त्रों में मंगलकारी कहा गया है। इससे भक्त और ईश्वर के बीच की ऊर्जा का संतुलन बना रहता है।
अत: जब भी भगवान की आरती करने या परिक्रमा करें तो दक्षिणावर्त दिशा में ही करें।
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