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    कन्यादान से बेटी हो जाती है पराई? शास्त्रों में छिपा है अर्थ, जिसे जानकर बदल जाएगी आपकी सोच

    Updated: Sat, 28 Mar 2026 11:00 AM (IST)

    कई लोग कन्यादान (Kanya Daan) का अर्थ "कन्या का दान" समझते हैं। चलिए शास्त्रों के अनुसार, जानते हैं कि इस शब्द के सही मानये क्या है। ...और पढ़ें

    शास्त्रों में क्या है कन्यादान का अर्थ? (AI Generated Image)

    शास्त्रों में क्या है कन्यादान का अर्थ? (AI Generated Image)

    HighLights

    1. आजीवन साथ का पवित्र प्रतीक है विवाह बंधन

    2. शास्त्रों में मिलता है 'पाणिग्रहण' शब्द का वर्णन

    3. भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कन्यादान का सही अर्थ

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। विवाह, हिंदू के सोलह संस्कारों में से एक है, जहां वर-वधू जीवन भर एक-दूसरे का साथ निभाने का प्रण लेते हैं। हिंदू विवाह (Hindu Marriage) में कई तरह के रीति-रिवाज व रस्में निभाई जाती हैं, जिसमें से कन्यादान भी एक है। कई लोग इसका अर्थ समझते हैं कि पिता द्वारा अपनी कन्या का दान करना। जबकि शास्त्रों में इसका अर्थ कुछ और ही मिलता है। चलिए पढ़ते हैं इसके बारे में।

    शास्त्रों में मिलता है ये वर्णन

    आपको यह जानकर हैरानी होगी कि ‘कन्यादान’ शब्द का जिक्र वैदिक और पौराणिक वाङ्मय में कही भी नहीं है। हिंदू धर्म शास्त्रों में कन्या दान के स्थान पर पाणिग्रहण शब्द का वर्णन मिलता है, जिसका अर्थ होता है 'हाथ थामना' या 'वधू का हाथ वर के हाथ में सौंपना'।

    इसे पाणिग्रहण संस्कार कहा जाता है, जो दो व्यक्तियों यानी स्त्री और पुरुष को आजीवन प्रेम सहयोग और विश्वास के धागे में बांधता है। पाणिग्रहण संस्कार केवल एक सामाजिक परिक्रिया नहीं है, बल्कि एक-दूसरे के प्रति समर्पण और एक नए जीवन की शुरुआत का भी पवित्र प्रतीक है।

    marriage AI

    भगवान श्री कृष्ण ने कही है ये बात

    महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने जब अर्जुन और सुभद्रा का गंधर्भ विवाह करवाया था, तो बलराम जी ने इसका यह कहते हुए विरोध किया कि सुभद्रा का कन्यादान नहीं हुआ है, ऐसे में इस विवाह को पूर्ण नहीं माना जा सकता। तब भगवान श्रीकृष्ण बलराम जी से कहते हैं कि कन्या कोई पशुधन नहीं है, जिसका दान किया जा सके। कन्यादान का सही अर्थ है कन्या का आदान न कि कन्या का दान करना।

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    Kanya Daan i(AI Generated Image)

    सही मानयों में कन्यादान का अर्थ

    हिंदू धर्म में दान का अर्थ है कि आपका उस वस्तु पर से अधिकार समाप्त हो जाता है। दान उस वस्तु का किया जाता है, जिसे आपने कमाया है या जिसपर आपका अधिकार है। लेकिन कन्या कोई वस्तु नहीं है, ऐसे में उसका दान नहीं किया जा सकता। इसलिए विवाह के दौरान की जाने वाली कन्या दान की रस्म का यह अर्थ बिल्कुल भी नहीं हैं, कि जिस पिता ने जीवनभर पुत्री का लालन-पालन किया है, उसपर से उनका अधिकार समाप्त हो जाएगा।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।