कन्यादान से बेटी हो जाती है पराई? शास्त्रों में छिपा है अर्थ, जिसे जानकर बदल जाएगी आपकी सोच
कई लोग कन्यादान (Kanya Daan) का अर्थ "कन्या का दान" समझते हैं। चलिए शास्त्रों के अनुसार, जानते हैं कि इस शब्द के सही मानये क्या है। ...और पढ़ें

शास्त्रों में क्या है कन्यादान का अर्थ? (AI Generated Image)
HighLights
आजीवन साथ का पवित्र प्रतीक है विवाह बंधन
शास्त्रों में मिलता है 'पाणिग्रहण' शब्द का वर्णन
भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कन्यादान का सही अर्थ
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। विवाह, हिंदू के सोलह संस्कारों में से एक है, जहां वर-वधू जीवन भर एक-दूसरे का साथ निभाने का प्रण लेते हैं। हिंदू विवाह (Hindu Marriage) में कई तरह के रीति-रिवाज व रस्में निभाई जाती हैं, जिसमें से कन्यादान भी एक है। कई लोग इसका अर्थ समझते हैं कि पिता द्वारा अपनी कन्या का दान करना। जबकि शास्त्रों में इसका अर्थ कुछ और ही मिलता है। चलिए पढ़ते हैं इसके बारे में।
शास्त्रों में मिलता है ये वर्णन
आपको यह जानकर हैरानी होगी कि ‘कन्यादान’ शब्द का जिक्र वैदिक और पौराणिक वाङ्मय में कही भी नहीं है। हिंदू धर्म शास्त्रों में कन्या दान के स्थान पर पाणिग्रहण शब्द का वर्णन मिलता है, जिसका अर्थ होता है 'हाथ थामना' या 'वधू का हाथ वर के हाथ में सौंपना'।
इसे पाणिग्रहण संस्कार कहा जाता है, जो दो व्यक्तियों यानी स्त्री और पुरुष को आजीवन प्रेम सहयोग और विश्वास के धागे में बांधता है। पाणिग्रहण संस्कार केवल एक सामाजिक परिक्रिया नहीं है, बल्कि एक-दूसरे के प्रति समर्पण और एक नए जीवन की शुरुआत का भी पवित्र प्रतीक है।

भगवान श्री कृष्ण ने कही है ये बात
महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने जब अर्जुन और सुभद्रा का गंधर्भ विवाह करवाया था, तो बलराम जी ने इसका यह कहते हुए विरोध किया कि सुभद्रा का कन्यादान नहीं हुआ है, ऐसे में इस विवाह को पूर्ण नहीं माना जा सकता। तब भगवान श्रीकृष्ण बलराम जी से कहते हैं कि कन्या कोई पशुधन नहीं है, जिसका दान किया जा सके। कन्यादान का सही अर्थ है कन्या का आदान न कि कन्या का दान करना।
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सही मानयों में कन्यादान का अर्थ
हिंदू धर्म में दान का अर्थ है कि आपका उस वस्तु पर से अधिकार समाप्त हो जाता है। दान उस वस्तु का किया जाता है, जिसे आपने कमाया है या जिसपर आपका अधिकार है। लेकिन कन्या कोई वस्तु नहीं है, ऐसे में उसका दान नहीं किया जा सकता। इसलिए विवाह के दौरान की जाने वाली कन्या दान की रस्म का यह अर्थ बिल्कुल भी नहीं हैं, कि जिस पिता ने जीवनभर पुत्री का लालन-पालन किया है, उसपर से उनका अधिकार समाप्त हो जाएगा।
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