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आग में घी जैसी हैं हमारी इच्छाएं: राजा ययाति की पौराणिक कथा में छिपा है सच्ची शांति का राज

Updated: Fri, 10 Jul 2026 04:00 PM (IST)

राजा ययाति की पौराणिक कथा जब ऋषि शुक्राचार्य के श्राप की वजह से उन्होनें अपनी जवानी खो दी और आखिर ...और पढ़ें

इच्छाओं को वश में रखना क्यों हैं जरूरी? (Picture Credits- AI Image)

इच्छाओं को वश में रखना क्यों हैं जरूरी? (Picture Credits- AI Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। इंसान की इच्छाएं कभी भी खत्म नहीं होती है। उसे किसी न किसी वस्तु की चाह हमेशा रहती है। इसी से जुड़ी एक पौराणिक कथा राजा ययाति से जुड़ी है, जो सिर्फ एक कथा मात्र नहीं बल्कि जीवन का सबसे जरूरी सबक भी सिखाती है।

राजा ययाति के पास धन, दौलत, ताकत और सालों तक दुनिया के सुख भोगने का मौका था। लेकिन एक गहरी सच्चाई ने उनकी सभी इच्छाओं को खत्म कर दिया। श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध 9 अध्याय 18-19 में राजा ययाति से जुड़ा एक प्रसंग देखने को मिलता है।

राजा ययाति से जुड़ी कहानी

राजा ययाति चंद्र वंश के सबसे महान और शक्तिशाली शासक थे। ऋषि शुक्राचार्य के श्राप की वजह से उन्होंने अपनी जवानी खो दी और समय से काफी पहले बूढ़े हो गए। दुनिया की भौतिक सुख-सुविधा और भोग का आनंद लेने के इच्छा से उन्होंने अपने बेटों से कहा कि, वे अपनी जवानी उनके बुढ़ापे के बदले में दे दें।

ययाति के अधिकतर बेटों ने ऐसा करने से मना कर दिया। लेकिन उनके सबसे छोटे बेटे पुरु पिता की आज्ञा का पालन करते हुए अपनी जवानी के बदले बुढ़ापा बदल लिया।

ययाति ने फिर से जवानी पाकर विषय सुख भोगना शुरू कर दिया। केवल भोगों में ही नहीं बल्कि ययाति ने धर्म का भी पालन किया। उन्होंने भगवान श्रीहरि के लिए बड़े-बड़े यज्ञ का आयोजन किया। एक हजार सालों तक अपनी इंद्रियों के साथ अनगिनत भोग भोगने के बाद भी ययाति की इच्छाएं खत्म नहीं हुई। इसके बाद एक दिन अचानक से राजा ययाति को एक बात याद आई।

न जातु कामः कामानां उपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥

भागवत पुराण के इस श्लोक में बताया गया है कि, विषयों के भोगने से भोग वासना कभी भी शांत नहीं हो सकती है। जैसे घी को आग पर डालने से आग और भड़क उठती है, वैसी ही भोग वासनाएं भी भोग करने से और प्रबल हो जाती है।

ऐसा कहने के बाद ययाति पूरु को उसकी जवानी लौटा देते हैं और अपना बूढ़ा शरीर वापस ले लेते हैं। इसके बाद उन्होंने दक्षिण पूर्व में द्रुह्यु, दक्षिण में यदु, पश्चिम में तुर्वसु और उत्तर में अनु को राज्य दे दिया। अपने सबसे योग्य पुत्र पूरु को संपूर्ण साम्राज्य का राजा बनाकर खुद प्रस्थान की ओर चले गए।

राजा ययाति की कथा

हिंदू दर्शन की यह कथा अमूल्य ज्ञान का प्रतीक

हिंदू दर्शन से जुड़ी यह कथा सिखाती है कि, सभी इच्छाएं बुरी नहीं होती है, बल्कि यह सिखाती है कि, असल खुशी इच्छाओं पर काबू पाने से आती है, उनके नियंत्रण में रहने से नहीं आती है। ऐसे में जो हमारे पास है हमें उसके लिए हमेशा आभारी होना चाहिए और संतोष रखना चाहिए।

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