पूजा में क्यों पहनते हैं कुश की अंगूठी? 90% लोग नहीं जानते इसके पीछे का गहरा रहस्य
हिंदू धर्म में पूजा-पाठ के दौरान कुश की अंगूठी पहनने का विशेष महत्व है, जिसे शास्त्रों में पवित्री कहते हैं। ...और पढ़ें

कुश की अंगूठी का धार्मिक महत्व (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में किसी भी पूजा, अनुष्ठान, यज्ञ या पितृ तर्पण के समय उंगली में कुश की अंगूठी पहनने का विधान है। इसे शास्त्रों में पवित्री के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, कुश की जड़ में भगवान ब्रह्मा, मध्य में भगवान विष्णु और सिरे में महादेव का वास माना जाता है।
इसलिए पूजा-पाठ के दौरान कुश अंगूठी को पहनने से त्रिदेवों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। साथ ही नकारात्मक शक्तियों से बचाव होता है। ऐसे में आइए आपको बताते हैं कि पूजा-पाठ केरान क्यों पहनी जाती है कुश की अंगूठी?

(AI Generated Image)
1. सूर्य पर्वत का स्थान
हस्तरेखा शास्त्र के मुताबिक, अनामिका उंगली के ठीक नीचे सूर्य पर्वत होता है और सूर्य तेज, यश और स्वास्थ्य का कारक हैं। इसलिए पूजा-पाठ के दौरान कुश की अंगूठी अनामिका उंगली में पहनने से सूर्य तत्व जागृत होता है। इससे जातक को आत्मिक बल और तेज की प्राप्ति होती है।
2. पवित्रता और शुद्धता
हिंदू धर्म में कुश को बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। मान्यता के मुताबिक, कुश की उत्पत्ति भगवान विष्णु के वराह अवतार के बाल से हुई थी। इसलिए कुश में भगवान विष्णु का वास माना जाता है। पूजा के दौरान इसे पहनने का अर्थ है कि जातक ने बाहरी और भीतरी दोनों रूपों से शुद्ध कर लिया है।
कुश की अंगूठी पहनने के नियम
शास्त्रों में कुश की अंगूठी पहनने के नियम के बारे में बताया गया है। इससे जुड़े नियम का पालन करना अनिवार्य माना जाता है
किस उंगली में पहनें- पूजा-पाठ के दौरान कुश की अंगूठी अनामिका उंगली में पहननी चाहिए।
देव पूजा- हवन या किसी मांगलिक काम और भगवान की पूजा के लिए 2 कुशाओं से बनी अंगूठी पहननी चाहिए।
पितृ कार्य- इसके अलावा श्राद्ध और तर्पण के दौरान 3 कुशाओं से बनी अंगूठी पहननी चाहिए।
ध्यान रखें ये बातें
- कुश की बनी अंगूठी खंडित नहीं होनी चाहिए। इसे पूजा, अनुष्ठान, तर्पण या संकल्प लेते समय ही पहनना चाहिए।
- पूजा के दौरान कुश की अंगूठी को कूड़े में नहीं फेंकना चाहिए। इसे किसी पवित्र नदी में बहा दें या फिर पीपल या बरगद की जड़ में रख देना चाहिए। इसे अशुद्ध हाथों से इसे स्पर्श नहीं करना चाहिए।
- गरुड़ पुराण में श्राद्ध और पितृ कर्म में कुश अनिवार्यता के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है।
यह भी पढ़ें- आज मनाया जा रहा है गंगा दशहरा, इस मुहूर्त में करें स्नान और दान, पापों से मिलेगी मुक्ति
यह भी पढ़ें- आज का पंचांग 25 मई 2026: गंगा दशहरा पर बन रहा वज्र योग का दुर्लभ संयोग, पढ़ें स्नान-दान का शुभ मुहूर्त
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।
देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।