मदुरई का मीनाक्षी मंदिर: देवी के 3 स्तनों से लेकर 33 हजार मूर्तियों तक, बेहद दिलचस्प मंदिर का इतिहास
मदुरई के मीनाक्षी मंदिर में देवी मीनाक्षी की प्रतिमा के तीन स्तन होने की पौराणिक कथा है। जानिए इस पौराणिक कथा के बारे में। ...और पढ़ें

मदुरई की मां मीनाक्षी देवी कौन हैं? (Picture Credit: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। तमिलनाडु के मदुरई में स्थित मां मीनाक्षी का मंदिर खास होने के साथ अत्यंत पवित्र माना जाता है। जिसे देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु दर्शने के लिए आते हैं।
मंदिर की वास्तुकला के साथ मीनाक्षी देवी की प्रतिमा भी लोगों को हैरान करती हैं, क्योंकि मंदिर में स्थापित मां मीनाक्षी देवी की प्रतिमा में तीन स्तन है। आइए जानते हैं इसके पीछे की पौराणिक कथा क्या कहती है?
मां मीनाक्षी से जुड़ी पौराणिक कथा?
मां मीनाक्षी से जुड़ी पौराणिक कथा के मुतबिक, मदुरई के पांड्य राजा की कोई संतान नहीं थी और देवताओं ने उन्हें अग्निकुंड से जन्मी एक बच्ची का आशीर्वाद प्रदान किया। उस बच्ची को लेकर भविष्यवाणी की गई थी, कि वयस्क होते ही उसके तीन स्तन होंगे, जिस दिन उसे अपने योग्य पुरुष मिलेगा उसका एक अतिरिक्त स्तन गायब हो जाएगा। उस राजकुमारी का नाम तदातागई रखा गया,जो बाद में मीनाक्षी के नाम से काफी प्रसिद्ध हुई, जिनके नेत्र मछली की आकृति की तरह सुंदर थे।
अपने पिता का उत्तराधिकार संभालने के बाद उसने उत्तर दिशा की ओर यात्रा करने का निश्चय किया। ब्रह्मांड के समस्त राजाओं, देवताओं, गणों और नंदी को पराजित किया और आखिर में एक युवा ऋषि से मुलाकात हुई, जो शिवजी ही थे। जब मीनाक्षी देवी की आंख शिवजी से मिलीं, तो मीनाक्षी को अनुभव हुआ कि, वह माता पार्वती का पुनर्जन्म है। उनका एक अतिरिक्त स्तन गायब हो गया। इसके बाद मां मीनाक्षी युवा ऋषि को अपने मदुरई नगर पति और संगिनी के रूप में ले गई। उन्होंने युवा ऋषि का नाम सुंदरेश्वर रखा, यानी सुंदर स्वामी।
मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथाओं के मुताबिक, 700 साल पहले पू्र्व मलिक काफूर नाम के एक मुस्लिम शासक ने पुराने मंदिर पर आक्रमण कर उसे लूटा था। इस मंदिर का जिक्र करीब 1200 साल पहले रचित सुंदरार की कविताओं में भी देखने को मिलता है। उस दौर में शिव पूजा धीरे-धीरे मदुरै में फल-फूल रही थी। इसके अलावा मदुरै ही वह पहला शहर था, जहां तमिल कवियों का पहला सम्मेलन आयोजित किया गया था, जिसे संगम के नाम से जाना जाता है।
मां मीनाक्षी का मंदिर
एक अनुमान के मुताबिक, मंदिर के गलियारों और मीनारों में 33 हजार से ज्यादा मूर्तियां हैं, जिनमें से हर एक की अपनी कहानी है। मंदिर में देवी-देवताओं के साथ सभी तरह के पौराणिक जीवों और आम लोगों की विशालकाय मूर्तियां हैं। वही मीनाक्षी की मुख्य मूर्ति में उन्हें प्रेम के देवता कामदेव के प्रतीक कहे जाने वाले तोते को पकड़े हुए दिखाया
गया है। मंदिर की दीवारों पर उनकी विवाह से जुड़े चित्र भी स्पष्ट रूप से देखने को मिलते हैं।
खबरें और भी
हर रात शिव की उत्सव मूर्ति को पालकी में बिठाकर मां मीनाक्षी के एकांत कक्ष में ले जाया जाता है। मंदिर के पुजारी फूलों से उनका भव्य स्वागत करते हैं और उन्हें मां मीनाक्षी के उत्सव मूर्ति के पास में झूले में बिठाया जाता है। इसके अलावा उनके कक्ष को खास सुंगधित चमेली के फूलों से सजाया जाता है और दीवारों पर शीशे लगे होते हैं। दिन भर राज्य की सुरक्षा करने के बाद मां पूरी रात अपने प्रियतम की आराधना करती हैं। इस तरह से हिंदू परंपराओं में संन्यासी से ज्यादा गृहस्थ का महत्व है।
यह भी पढ़ें- काशी से मदुरै तक: उत्तर और दक्षिण के मंदिरों की पूजा और परंपराओं में ये 5 बड़े अंतर
यह भी पढ़ें- 700 साल पहले किसने खोजी थी माता वैष्णो देवी की पवित्र गुफा? पढ़ें पौराणिक कथा
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।