Pradosh Vrat 2026: प्रदोष व्रत पर शाम के समय करें यह एक काम, शादी की मुश्किलें होंगी दूर
प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat 2026) भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत है। इस साल यह आज यानी 30 जनवरी 2026 को पड़ रहा है। यह व्रत विश ...और पढ़ें

Pradosh Vrat 2026: प्रदोष व्रत पर करें ये काम।
HighLights
हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का बहुत ज्यादा महत्व है
यह भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है
इस साल प्रदोष व्रत आज यानी 30 जनवरी को मनाया जा रहा है
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। Pradosh Vrat 2026: हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का बहुत ज्यादा महत्व है। यह भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। इस साल प्रदोष व्रत आज यानी 30 जनवरी को मनाया जा रहा है। वहीं, आज के दिन ग्रहों की विशेष स्थिति बन रही है, जो उन लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, जिनके विवाह में देरी हो रही है या वैवाहिक जीवन में तनाव चल रहा है। शास्त्रों के अनुसार, प्रदोष व्रत पर शाम का समय सबसे ज्यादा फलदायी और शक्तिशाली माना जाता है।
ऐसे में इस समय शिव-पार्वती के सामने एक घी का दीपक जलाएं। फिर उन्हें फल, मेवा, फूल-माला और शृंगार की सामग्री अर्पित करें। इसके बाद ''पार्वती चालीसा'' का पाठ कर आरती करें। ऐसा करने से शादी की सभी अड़चनें दूर होंगी।
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।।पार्वती चालीसा।।
॥ दोहा ॥
जय गिरी तनये दक्षजे,शम्भु प्रिये गुणखानि।
गणपति जननी पार्वती,अम्बे! शक्ति! भवानि॥
॥ चौपाई ॥
ब्रह्मा भेद न तुम्हरो पावे।
पंच बदन नित तुमको ध्यावे॥
षड्मुख कहि न सकत यश तेरो।
सहसबदन श्रम करत घनेरो॥
तेऊ पार न पावत माता।
स्थित रक्षा लय हित सजाता॥
अधर प्रवाल सदृश अरुणारे।
अति कमनीय नयन कजरारे॥
ललित ललाट विलेपित केशर।
कुंकुम अक्षत शोभा मनहर॥
कनक बसन कंचुकी सजाए।
कटी मेखला दिव्य लहराए॥
कण्ठ मदार हार की शोभा।
जाहि देखि सहजहि मन लोभा॥
बालारुण अनन्त छबि धारी।
आभूषण की शोभा प्यारी॥
नाना रत्न जटित सिंहासन।
तापर राजति हरि चतुरानन॥
इन्द्रादिक परिवार पूजित।
जग मृग नाग यक्ष रव कूजित॥
गिर कैलास निवासिनी जय जय।
कोटिक प्रभा विकासिन जय जय॥
त्रिभुवन सकल कुटुम्ब तिहारी।
अणु अणु महं तुम्हारी उजियारी॥
हैं महेश प्राणेश! तुम्हारे।
त्रिभुवन के जो नित रखवारे॥
उनसो पति तुम प्राप्त कीन्ह जब।
सुकृत पुरातन उदित भए तब॥
बूढ़ा बैल सवारी जिनकी।
महिमा का गावे कोउ तिनकी॥
सदा श्मशान बिहारी शंकर।
आभूषण हैं भुजंग भयंकर॥
कण्ठ हलाहल को छबि छायी।
नीलकण्ठ की पदवी पायी॥
देव मगन के हित अस कीन्हों।
विष लै आपु तिनहि अमि दीन्हों॥
ताकी तुम पत्नी छवि धारिणि।
दूरित विदारिणी मंगल कारिणि॥
देखि परम सौन्दर्य तिहारो।
त्रिभुवन चकित बनावन हारो॥
भय भीता सो माता गंगा।
लज्जा मय है सलिल तरंगा॥
सौत समान शम्भु पहआयी।
विष्णु पदाब्ज छोड़ि सो धायी॥
तेहिकों कमल बदन मुरझायो।
लखि सत्वर शिव शीश चढ़ायो॥
नित्यानन्द करी बरदायिनी।
अभय भक्त कर नित अनपायिनी॥
अखिल पाप त्रयताप निकन्दिनि।
माहेश्वरी हिमालय नन्दिनि॥
काशी पुरी सदा मन भायी।
सिद्ध पीठ तेहि आपु बनायी॥
भगवती प्रतिदिन भिक्षा दात्री।
कृपा प्रमोद सनेह विधात्री॥
रिपुक्षय कारिणि जय जय अम्बे।
वाचा सिद्ध करि अवलम्बे॥
गौरी उमा शंकरी काली।
अन्नपूर्णा जग प्रतिपाली॥
सब जन की ईश्वरी भगवती।
पतिप्राणा परमेश्वरी सती॥
तुमने कठिन तपस्या कीनी।
नारद सों जब शिक्षा लीनी॥
अन्न न नीर न वायु अहारा।
अस्थि मात्रतन भयउ तुम्हारा॥
पत्र घास को खाद्य न भायउ।
उमा नाम तब तुमने पायउ॥
तप बिलोकि रिषि सात पधारे।
लगे डिगावन डिगी न हारे॥
तब तव जय जय जय उच्चारेउ।
सप्तरिषि निज गेह सिधारेउ॥
सुर विधि विष्णु पास तब आए।
वर देने के वचन सुनाए॥
मांगे उमा वर पति तुम तिनसों।
चाहत जग त्रिभुवन निधि जिनसों॥
एवमस्तु कहि ते दोऊ गए।
सुफल मनोरथ तुमने लए॥
करि विवाह शिव सों हे भामा।
पुनः कहाई हर की बामा॥
जो पढ़िहै जन यह चालीसा।
धन जन सुख देइहै तेहि ईसा॥
॥ दोहा ॥
कूट चन्द्रिका सुभग शिर,जयति जयति सुख खानि।
पार्वती निज भक्त हित,रहहु सदा वरदानि॥
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