देवव्रत से भीष्म तक का सफर: राजकुमार जिसने एक प्रतिज्ञा के लिए दांव पर लगा दिया अपना पूरा जीवन
जानिए देवव्रत के भीष्म पितामह बनने की पूरी कहानी। कैसे एक राजकुमार ने पिता के सुख के लिए राजपाट त्यागा और आजीवन ब्रह्मचर्य की भीषण प्रतिज्ञा ली। ...और पढ़ें

महाभारत कथा: आखिर क्यों देवव्रत को लेनी पड़ी 'भीषण प्रतिज्ञा'? (Image Source: AI-Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। महाभारत गाथा में अगर किसी एक चरित्र का नाम त्याग और अटल संकल्प के लिए स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है, तो वह हैं भीष्म पितामह। वह एक ऐसे राजकुमार थे, जिन्होंने न केवल राजपाट त्यागा, बल्कि अपने पिता की खुशी के लिए अपने सुखों की ऐसी आहुति दी, जिसकी मिसाल आज तक दी जाती है। देवव्रत का भीष्म बनने का सफर पितृभक्ति और कठोर अनुशासन की एक अमर गाथा है। आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।

(Image Source: AI-Generated)
कौन थे देवव्रत?
देवव्रत हस्तिनापुर के राजा शांतनु और देवनदी गंगा के आठवें पुत्र थे। उन्होंने महर्षि वशिष्ठ से वेदों का ज्ञान और परशुराम जी से शस्त्र विद्या सीखी थी। वह हर तरह से राज्य के योग्य उत्तराधिकारी और एक महान योद्धा थे, लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था।
वह मोड़, जिसने इतिहास बदल दिया
राजा शांतनु एक बार यमुना के तट पर घूम रहे थे, जहां उन्हें निषादराज की पुत्री सत्यवती से प्रेम हो गया। शांतनु ने जब सत्यवती का हाथ मांगा, तो उनके पिता निषादराज ने एक शर्त रखी कि सत्यवती की संतान ही हस्तिनापुर की उत्तराधिकारी होनी चाहिए। राजा शांतनु देवव्रत से बहुत प्रेम करते थे और उन्हें उनके अधिकार से वंचित नहीं करना चाहते थे, इसलिए वे वहां से चले आएं और उदास रहने लगे।
जब देवव्रत को अपने पिता के दुख का कारण पता चला, तो वे निषादराज के पास पहुंचे। उन्होंने उसी समय सभा के सामने दो कठोर प्रतिज्ञाएं लीं। पहली प्रतिज्ञा कि मैं कभी राजा नहीं बनूंगा और सत्यवती का पुत्र ही राजा होगा। उनकी दूसरी प्रतिज्ञा यह थी कि वे विवाह नहीं करेंगे और और ब्रह्मचारी बनकर अपना पूरा जीवन गुजारेंगे।
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देवव्रत कैसे बने भीष्म?
उनके इस कठोर संकल्प को देखकर आकाश से देवताओं ने फूलों की बारिश की और उन्हें भीष्म की उपाधि दी। यानी कि ऐसा व्यक्ति जो अपनी कठोर प्रतिज्ञा को निभाने वाला हो। साथ ही, उनके पिता शांतनु ने इस महात्याग से खुश होकर उन्हें 'इच्छा मृत्यु' का वरदान दिया, यानी जब तक भीष्म स्वयं न चाहें, काल (मृत्यु) उन्हें छू भी नहीं सकता था।
अपनी प्रतिज्ञा निभाई
भीष्म ने अपना पूरा जीवन हस्तिनापुर की रक्षा और अपनी प्रतिज्ञा को निभाने में लगा दिया। उन्होंने कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध को रोकने का काफी प्रयास किया, लेकिन अंत में उन्हें सिंहासन के प्रति अपनी निष्ठा के चलते अधर्म की ओर से लड़ना पड़ा। बाणों की शय्या पर लेटे हुए भी उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा और कर्तव्यों को निभाया।
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