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    Mesh Sankranti 2026: मेष संक्रांति पर सूर्य चालीसा के पाठ से कुंडली में बनेगा राजयोग, पढ़ें नियम

    Updated: Sun, 05 Apr 2026 05:45 PM (IST)

    मेष संक्रांति के दिन (Mesh Sankranti 2026) सूर्य चालीसा का पाठ करने से सूर्य देव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। ...और पढ़ें

    Mesh Sankranti 2026: सूर्य चालीसा का पाठ। (Ai Generated Image)

    Mesh Sankranti 2026: सूर्य चालीसा का पाठ। (Ai Generated Image)

    HighLights

    1. मेष संक्रांति 14 अप्रैल को मनाई जाएगी

    2. इस दिन सूर्य चालीसा के पाठ से शुभ फलों की प्राप्ति होती है

    3. मेष संक्रांति के पुण्य काल में स्नान-दान का विशेष महत्व है

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। Mesh Sankranti 2026: हिंदू पंचांग के अनुसार, जब सूर्य देव मीन राशि से निकलकर मेष में प्रवेश करते हैं, तो इसे मेष संक्रांति कहा जाता है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य का मेष राशि में जाना बेहद शुभ माना गया है, क्योंकि यहां सूर्य सबसे अधिक बलशाली होते हैं। इस साल मेष संक्रांति का पर्व उन लोगों के लिए वरदान की तरह है, जो करियर में लगातार मुश्किलों का सामना कर रहे हैं या समाज में मान-सम्मान की इच्छा रखते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस विशेष दिन पर विधि-विधान से सूर्य चालीसा का पाठ करने से कुंडली के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं और सूर्य देव की कृपा मिलती है।

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    सूर्य चालीसा पाठ नियम

    • मेष संक्रांति के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें।
    • स्नान के बाद तांबे के लोटे में जल, लाल फूल, अक्षत और गुड़ डालकर सूर्य देव को अर्घ्य दें।
    • अर्घ्य देते समय मन में सूर्य देव के मंत्रों का जप करते रहें।
    • सूर्य चालीसा का पाठ करें।
    • पूजा के दौरान लाल आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
    • घी का दीपक जलाएं और पूरी एकाग्रता के साथ सूर्य चालीसा का पाठ करें।
    • पाठ के बाद सूर्य देव की आरती जरूर करें।
    • मेष संक्रांति के दिन नमक का सेवन न करें।
    • सात्विक भोजन या फलाहारी करें। इससे सूर्य कृपा मिलती है।

    ।।सूर्य चालीसा का पाठ।।

    ।।दोहा।।

    कनक बदन कुंडल मकर, मुक्ता माला अंग।

    पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के संग।।

    ।।चौपाई।।

    जय सविता जय जयति दिवाकर, सहस्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर।

    भानु, पतंग, मरीची, भास्कर, सविता, हंस, सुनूर, विभाकर।

    विवस्वान, आदित्य, विकर्तन, मार्तण्ड, हरिरूप, विरोचन।

    अम्बरमणि, खग, रवि कहलाते, वेद हिरण्यगर्भ कह गाते।

    सहस्रांशु, प्रद्योतन, कहि कहि, मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि।

    अरुण सदृश सारथी मनोहर, हांकत हय साता चढ़‍ि रथ पर।

    मंडल की महिमा अति न्यारी, तेज रूप केरी बलिहारी।

    उच्चैश्रवा सदृश हय जोते, देखि पुरन्दर लज्जित होते।

    मित्र, मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर, सविता,

    सूर्य, अर्क, खग, कलिहर, पूषा, रवि,

    आदित्य, नाम लै, हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै।

    द्वादस नाम प्रेम सो गावैं, मस्तक बारह बार नवावै।

    चार पदारथ सो जन पावै, दुख दारिद्र अघ पुंज नसावै।

    नमस्कार को चमत्कार यह, विधि हरिहर कौ कृपासार यह।

    सेवै भानु तुमहिं मन लाई, अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई।

    बारह नाम उच्चारन करते, सहस जनम के पातक टरते।

    उपाख्यान जो करते तवजन, रिपु सों जमलहते सोतेहि छन।

    छन सुत जुत परिवार बढ़तु है, प्रबलमोह को फंद कटतु है।

    अर्क शीश को रक्षा करते, रवि ललाट पर नित्य बिहरते।

    सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत, कर्ण देश पर दिनकर छाजत।

    भानु नासिका वास करहु नित, भास्कर करत सदा मुख कौ हित।

    ओठ रहैं पर्जन्य हमारे, रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे।

    कंठ सुवर्ण रेत की शोभा, तिग्मतेजसः कांधे लोभा।

    पूषा बाहु मित्र पीठहिं पर, त्वष्टा-वरुण रहम सुउष्णकर।

    युगल हाथ पर रक्षा कारन, भानुमान उरसर्मं सुउदरचन।

    बसत नाभि आदित्य मनोहर, कटि मंह हंस, रहत मन मुदभर।

    जंघा गोपति, सविता बासा, गुप्त दिवाकर करत हुलासा।

    विवस्वान पद की रखवारी, बाहर बसते नित तम हारी।

    सहस्रांशु, सर्वांग सम्हारै, रक्षा कवच विचित्र विचारे।

    अस जोजजन अपने न माहीं, भय जग बीज करहुं तेहि नाहीं।

    दरिद्र कुष्ट तेहिं कबहुं न व्यापै, जोजन याको मन मंह जापै।

    अंधकार जग का जो हरता, नव प्रकाश से आनन्द भरता।

    ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही, कोटि बार मैं प्रनवौं ताही।

    मन्द सदृश सुतजग में जाके, धर्मराज सम अद्भुत बांके।

    धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा, किया करत सुरमुनि नर सेवा।

    भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों, दूर हटत सो भव के भ्रम सों।

    परम धन्य सो नर तनधारी, हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी।

    अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन, मध वेदांगनाम रवि उदय।

    भानु उदय वैसाख गिनावै, ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै।

    यम भादों आश्विन हिमरेता, कातिक होत दिवाकर नेता।

    अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं, पुरुष नाम रवि हैं मलमासहिं।

    ।।दोहा।।

    भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य।

    सुख सम्पत्ति लहै विविध, होंहि सदा कृतकृत्य।।

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