हिंदू धर्म की वो रहस्यमय देवी, जो भव्य मंदिरों में नहीं बल्कि घने जंगलों में बसती हैं!
आरण्यनी देवी वैदिक काल की वन देवी हैं, जो शांत वनों में निवास करती हैं और प्रकृति व वन्यजीवों की रक्षक हैं। ऋग्वेद में वर्णित यह देवी वनों की प्रचुरता ...और पढ़ें

वनों की देवी आरण्यनी कौन हैं? (Picture Credits- AI Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में जहां कुछ देवी-देवताओं के विशाल मंदिर और भव्य त्योहारों को धूमधाम से मनाया जाता है, वहीं कुछ ऐसे भी देवी-देवता हैं जो भीड़ से अलग शांत जगह पर निवास करतचे हैं जहां हम शायद ही कभी जाते हैं। इन देवी में जंगलों की मायावी देवी आरण्यनी भी शामिल हैं।
एक वैदिक देवी होने के कारण वह घने पेड़ों के बीच में विराजमान हैं और अपने क्षेत्र में सभी जीवों का मार्गदर्शन और बचाव करती हैं। पौराणिक कथाओं में उन्हें कम ही महत्व दिया गया है। ऋग्वेद से लेकर ग्रामीण लोक मान्यताओं तक आरण्यनी प्रकृति की प्रचुरता, पारिस्थितिक संतुलन और वन्य जीवन का प्रतिनिधित्व करती हैं।
वन की देवी
आरण्यनी नाम संस्कृत के शब्द अरण्य से लिया गया है, जिसका मतलब वन या निर्जन क्षेत्र होता है। वह सिर्फ पेड़ों की ही रक्षा नहीं करती हैं, बल्कि वन, उसके विकास, उसके रहस्यों और उसकी जीवंतता का भी साक्षात स्वरूप हैं।
उनकी उपस्थिति हमें याद दिलाती है कि, वन पवित्र स्थान हैं, जो आदर और श्रद्धा के पात्र हैं, क्योंकि वे सभी तरह के जीवन का आधार हैं।

मायावी और रहस्यमय
आरण्यनी को मनुष्य शायद ही पहले कभी देख पाते हैं। वैदिक ग्रंथों के मुताबिक, वह वनों और उपवनों में सुंदर नृत्य करती हैं, तो उनके पायल में बंधी घंटियों की मधुर झंकार सुनाई देती है। उनका यह मायावी गुण उन्हें मनमोहक और प्रतीकात्मक बनाता है।
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आरण्यनी देवी जंगलों की जीवन शक्ति हैं। वे वनस्पतियों और जीव-जंतुओं के कल्याण को सुनिश्चित करती हैं। ग्रामीण अक्सर उन्हें सम्मान देने के लिए वन में कुछ न कुछ भेंट छोड़ते हैं। उनका मानना है कि, देवी के आशीर्वाद से ही मानव जीवन और प्राकृतिक जगत दोनों का अस्तित्व बना रहता है।
ऋग्वेद में मां आरण्यनी का उल्लेख
ऋग्वेद धर्म से जुड़े सबसे प्राचीन ग्रंथों में इसका वर्णन देखने को मिलता है। आज भले ही देवी आरण्यनी की पूजा-अर्चना नहीं होती, फिर भी उनकी उपस्थिति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। उनकी कहानी इस बात का प्रतीक है कि, प्रकृति का सम्मान करना बेहद जरूरी है।
उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि, जंगल सिर्फ एक संसाधन नहीं है, बल्कि एक जीवंत और सजीव स्थान है जिसकी अपनी आत्मा है और जो आदर और देखभाल के योग्य है।
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।