नारली पूर्णिमा 2026: रक्षाबंधन के दिन मनेगा मछुआरों का यह खास पर्व, जानिए कैसे की जाती है वरुण देव की पूजा?
भारत के पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में मछुआरों द्वारा नारली पूर्णिमा उत्साह से मनाई जाती है, जो समुद्र के देवता वरुण ...और पढ़ें

नारली पूर्णिमा का महत्व (Picture Credits- AI Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भारत के पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में रहने वाले मछुआरों द्वारा नारली पूर्णिमा (जिसे स्थानीय भाषा में नारियल उत्सव के नाम से भी जाना जाता है) बड़े ही उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से समुद्र के देवता वरुण देव को समर्पित है।
यह उत्सव हिंदू कैलेंडर में श्रावण के महीने में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है, जिसे वजह से इसे 'श्रावण पूर्णिमा' के नाम से भी जाना जाता है। इस साल नारली पूर्णिमा का पर्व 28 अगस्त 2026, शुक्रवार के दिन मनाया जाएगा। इस दिन रक्षाबंधन और आंशिक चंद्र ग्रहण भी है।
नारली पूर्णिमा के दिन नारियल खास महत्व रखता है। इस त्योहार के दौरान लोग समुद्र में नारियल अर्पित करते हैं। इसके अलावा यह भी माना जाता है कि इस दिन के बाद से ही हवा का रुख और ताकत मछली पकड़ने के पक्ष में बदल जाती है।
नारली पूर्णिमा का महत्व
भारत में महाराष्ट्र और उसके आसपास के कोंकणी क्षेत्रों में नारली पूर्णिमा के उत्सव को बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। मछुआरा समुदाय से जुड़े लोग समुद्र में नौकायन करते हैं।
महाराष्ट्र में इस त्योहार को मानसून के मौसम का अंत और मछुआरों के बीच मछली पकड़ने और जल-व्यापार की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। नाच और गाना इस उत्सव का अहम हिस्सा होता है।

नारली पूर्णिमा मंत्र
ऊं वरुणाय नम:
नारली पूर्णिमा अनुष्ठान
नारली पूर्णिमा से कुछ दिन पहले से ही मछुआरे अपने पुराने मछली पकड़ने के जाल को मरम्मत कर बेहतर करते हैं। अपनी पुरानी नावों को पेंट करने के साथ नई नावें भी खरीदी जाती और मछली के नए जाल भी बनाए जाते हैं। इसके बाद नावों को रंग-बिरंगे फूलों और सजावटी सामान से सजाया जाता है।
नारली पूर्णिमा के मौके पर लोग समु्द्र देवता की पूजा-अर्चना करते हैं। इसके अलावा उनसे मछली पकड़ने, समुद्री लहरों से सुरक्षा और अच्छे मौसम के लिए कामना करते हैं।
वहीं महाराष्ट्र राज्य में ब्राह्मण 'श्रावणी उपकर्म' करते हैं और इस दिन बिना किसी अनाज के सेवन किए व्रत का पालन करते हैं। वे पूरे दिन सिर्फ नारियल खाकर व्रत का पालन करते हैं।
इस खास तिथि पर पारंपरिक भोजन जिसमें नारियल भी शामिल होता है, पकाया जाता है। जिसमें नराली भात या मीठे नारियल के चावल होते हैं।
मछुआरों के लिए समुद्र काफी पवित्र जगह है क्योंकि यह उनके जीवित रहने का एकमात्र जरिया है। वे समुद्र की पूजा के साथ नावों की भी पूजा करते हैं।
पूजा अनुष्ठान पूरा करने के बाद मछुआरे अपनी नई नावों को समुद्र में तैराते हैं। एक छोटी यात्रा करने के बाद वे किनारे पर लौट आते हैं और पूरे दिन नाच-गाना करते हैं।
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