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    यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Feb 18, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

    मन पर पड़ी हुई मान्यताओं का बोझ हमारी आत्मोन्नति में बाधक बनता है

    By Preeti jhaEdited By:
    Updated: Thu, 18 Feb 2016 11:13 AM (IST)

    मन पर पड़ी हुई मान्यताओं का बोझ हमारी आत्मोन्नति में बाधक बनता है, इसलिए इस बोझ को उतार देना ही श्रेयस्कर है... ...और पढ़ें

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    मन पर पड़ी हुई मान्यताओं का बोझ हमारी आत्मोन्नति में बाधक बनता है, इसलिए इस बोझ को उतार देना ही

    श्रेयस्कर है...

    एक प्रसिद्ध जेन-बौद्ध कहानी है। दो बौद्ध संन्यासी कहीं जा रहे थे। वे कीचड़ से भरे मार्ग पर आ गए। उन्हें सड़क के

    किनारे एक किशोरी दिखती है, जो सड़क पार करने से इसलिए कतरा रही थी कि उसके कपड़े कहीं गंदे न हो जाएं। पुराना संन्यासी किशोरी तक जाता है और उसे गोद में उठाकर कीचड़ में डग भरता हुआ सड़क के दूसरी ओर ले जाकर छोड़ देता है। उसी रात भोजन करते समय नए संन्यासी ने पुराने संन्यासी से कहा, ‘हम संन्यासी हैं और हमें स्त्रियों से बातें करना भी निषेध है, फिर भी आपने उस स्त्री को अपनी गोद में उठा लिया!’ पुराने संन्यासी ने कहा, ‘मैंने तो उस लड़की को उसी समय सड़क के दूसरी ओर छोड़ दिया था, तुम तो उसे अभी भी उठाए घूम रहे हो।’ ऐसा ही है। हम विचारों और मान्यताओं से जकड़े हुए हैं। वे हमारे मन-मस्तिष्क को दुविधाओं और चिंताओं से ग्रस्त रखती हैं। हम सर्वथा उनके खंडन-मंडन के द्वंद्व में ही उलझे रहते हैं। इनके कारण हमारी आत्मोन्नति की राह में नित नए अवरोध आते रहते हैं।

    मेरे लिए आध्यात्मिकता किसी दर्शन या मत विशेष से जुड़ाव नहीं, बल्कि मानव चेतना के सबसे शुद्ध सद्गुणों की स्थापना है। क्षमा, करुणा, दया, जागृति बोध, प्रेम, बंधुत्व, मैत्री,उपकार, अगर्व और ऐसे ही अनेक सद्गुण

    आध्यात्मिकता का आधार हैं। इनमें भी करुणा और क्षमाशीलता का महत्व औरों से कहीं बढ़कर है, क्योंकि चित्त में गहराई तक व्याप्त हो चुके अहंकार से उपजे क्रोध के समाप्त होने के उपरांत ही ऐसे सर्वहितकारी भाव उपजते हैं।

    स्वयं को दूसरों की स्थिति में रखकर विचार करना भी करुणा का ही एक प्रमुख लक्षण है। जब तक हम स्वयं को उनके स्थान पर नहीं रखेंगे, हम उनके दु:ख और वेदना का अनुभव नहीं कर सकते। क्या स्वयं के प्रति करुणा भाव का जागना क्षमाशीलता नहीं है? इसमें किसी दूसरे व्यक्ति को उसके दुखों से मुक्त करने का नहीं, बल्कि स्वयं को उस अप्रसन्नता से उबारने का यत्न है, जो किसी घटना के प्रति खिन्नता होने या किसी व्यक्ति को क्षमा नहीं करने से पैदा हुई हो।

    नए संन्यासी की ही भांति हम भी उन घटनाओं और विचारों का बोझ उठाये फिर रहे हैं, जो अयथार्थ हैं। वे मानवीय कमजोरियां हैं, जिनका हमें कभी-कभी पता ही नहीं चल पाता। वे पैरों से बंधे हुए अदृश्य पाषाण खंड

    हैं, जिनके साथ दुर्गम चढ़ाई करना असंभव है। इस तथ्य का भान बहुत कम ही होता है कि क्षमाशीलता का तात्पर्य केवल किसी अनुचित/ अवैध कर्म को क्षमा कर देना ही नहीं है, बल्कि उसे कार्य, कारण एवं कर्म सिद्धांत के हवाले छोड़कर आगे बढ़ जाना है। इसका अर्थ यह भी नहीं कि अनुचित या अवांछित कर्म करने वाले को किसी प्रकार का प्रोत्साहन या बुराई को आश्रय मिले। इसका उद्देश्य बस इतना ही है कि हमें सतत यह होश बना रहे कि सड़क के दूसरी ओर पहुंचने के बाद बोझ को उतार देना है।

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