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किसी की कड़वी बात से पूरा दिन खराब हो जाता है? प्रेमानंद महाराज से समझिए मन को शांत रखने का फॉर्मूला

Published: Sat, 07 Nov 2026 01:30 PM (IST)

प्रेमानंद महाराज ने बताया कि कैसे दूसरों की बातें हमारे मन पर असर डालती हैं और हमें उन्हें खुद पर ...और पढ़ें

प्रेमानंद महाराज जी के अनुसार मन पर नियंत्रण

प्रेमानंद महाराज जी के अनुसार मन पर नियंत्रण

HighLights

  1. दूसरों की बातें उनकी सोच दर्शाती हैं, आपकी वास्तविक स्थिति नहीं।

  2. समस्या शब्दों में कम, हमारी प्रतिक्रिया में ज्यादा होती है।

  3. प्रशंसा और आलोचना दोनों में समान भावना रखना आवश्यक है।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हम सभी लोगों के साथ कभी न कभी ऐसा जरूर हुआ होगा कि, हमें किसी की बात इतनी बुरी लग गई कि उसके चक्कर में हमारा पूरा दिन खराब हो गया। किसी ने हमारी आलोचना कर दी और हम बार-बार बस उसी बात को सोचते हैं। जब कोई हमारी मन की बात नहीं करता है या हमारी आलोचना कर देता तो मन काफी दुखी हो जाता है।

इसी विषय पर वृंदावन के संत श्री प्रेमानंद महाराज जी ने बताया है कि, कैसे दूसरों की बात हमारे मन पर असर दिखाती है और हमें कैसे दूसरों की बातों को खुद पर हावी नहीं होने देना है।

दूसरों की बातों से अपना मन क्यों दुखी नहीं रहना चाहिए?

प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि, कई बार दूसरे व्यक्ति द्वारा कही गई बात उसकी अपनी सोच को दर्शाती है, न कि आपकी वास्तविक स्थित को। कोई आपको कहता है कि, 'तुम कुछ नहीं कर सकते।' यह असल में उसके अपने विचार हैं और उसके द्वारा कही गई बातें आपके भविष्य का प्रमाण नहीं है।

इसी तरह कोई आपके बारे में कहता है कि, 'तुम काफी अच्छे हो।' यह विचार भी उसी का है। ऐसे में आपकी पूरी पहचान सिर्फ किसी की प्रशंसा या आलोचना तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए। प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि, व्यक्ति को अपने बारे में हर अच्छी और बुरी बात सुननी चाहिए, लेकिन हर बात को खुद से जोड़ना सही नहीं है।

समस्या शब्दों में कम, हमारी प्रतिक्रिया में ज्यादा

प्रेमानंद महाराज के मुताबिक, किसी व्यक्ति ने आपको अपमानित करने वाली बात कही। उसके शब्द कुछ सेंकड तक चले लेकिन अगर आप उसी बात को पूरी दिन सोचते रहें तो दुख कई घंटों तक चलता रहेगा।

कहने का अर्थ है कि घटना भले ही छोटी थी लेकिन मन ने उसे बार-बार दोहराकर बड़ा बना दिया है। इसलिए खुद से पूछना चाहिए कि, 'उस व्यक्ति की बात मुझे कितनी देर तक परेशान करेगी, यह कौन तय कर रहा है?'

दूसरा व्यक्ति सिर्फ शब्द बोल सकता है। उन शब्दों को बार-बार सोचना आपके हाथ में है।

तारीफ और आलोचना में एक जैसी भावना क्यों जरूरी?

प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि, अगर आप दूसरों की आलोचना से काफी दुखी हो जाते हैं, तो अक्सर उसके पीछे दूसरे ओर प्रशंसा की काफी ज्यादा जरूरत भी हो सकती है। जब लोग तारीफ करते हैं तो आप खुश हो जाते हैं। वहीं जब लोग आलोचना करते हैं तो आप दुखी हो जाते हैं।

इसका मतलब आपकी भावनाएं पूरी तरह से दूसरों की राय पर निर्भर करती है। आज कोई तारीफ करेगा तो खुशी मिलेगी और कल कोई आलोचना करेगा तो दुख पहुंचेगा। ऐसे में आपकी मानसिक स्थिति का नियंत्रण दूसरों के हाथ में चला जाता है। इसीलिए व्यक्ति को प्रशंसा और आलोचना में एक समान भावना ही रखनी चाहिए।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।

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