आखिर किस मजबूरी में भगवान श्रीराम को देना पड़ा था प्राण से प्यारे लक्ष्मण को मृत्युदंड?
आज हम आपको रामायण के उत्तराकांड का एक प्रसंग बताने जा रहे हैं, जिसमें यह वर्णन मिलता है कि भगवान ...और पढ़ें

श्रीराम ने किस मजबूरी में दिया लक्ष्मण को मृत्युदंड? (Picture Credit- AI Generated)
HighLights
यमराज ने श्रीराम से एकांत वार्ता की रखी थी शर्त
ऋषि दुर्वासा के क्रोध से बचने लक्ष्मण ने किया प्रवेश
लक्ष्मण ने सरयू नदी में जल समाधि लेकर त्यागे प्राण
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। रामायण, महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित एक प्राचीन भारतीय महाकाव्य है, जिसमें हैरान कर देने वाले कई प्रसंग मिलते हैं। आज हम आपको एक ऐसे ही प्रसंग के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसके बारे में कम ही लोग जानते होंगे। रामायण के उत्तराकांड में जिक्र मिलता है कि प्रभु श्रीराम को अपने भाई लक्ष्मण को एक भयानक दंड देने पड़ा था। चलिए जानते हैं इस बारे में।
यमराज ने रखी ये शर्त
रामायण के उत्तराकांड में वर्णित कथा के अनुसार, रावण वध और वनवास से वापस लौटने के बाद राम जी अयोध्या के राजा बन गए और शासन करने लगे। एक दिन मृत्यु के देवा यमराज एक ऋषि का रूप धारण कर श्रीराम जी से मिलने के लिए अयोध्या पहुंचे। वह राम जी से एकांत में बात करना चाहते थे। उन्होंने एक शर्त भी रखी कि हमारी बातचीत के बीच अगर कोई भी आता है, तो उसे मृत्युदंड दिया जाए। तब भगवान राम ने लक्ष्मण को यमराज की शर्त बताते हुए द्वार पर पहरा देने के लिए कहा।

(Picture Credit: Freepik) (AI Image)
लक्ष्मण ने मजबूरी में उठाया यह कदम
इस बीच ऋषि दुर्वासा वहां आ पहुंचे, जो अत्यधिक क्रोध और श्राप देने के लिए जाने जाते थे। वह राम जी से शीघ्र ही मिलना चाहते थे। लक्ष्मण ने उन्होंने रोकने और समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह नहीं माने। लक्ष्मण के रोकने पर ऋषि दुर्वासा बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने कहा कि अगर तुमने मुझे श्रीराम से नहीं मिलने दिया, तो मैं पूरी अयोध्या नगरी को अपने श्राप से जलाकर राख कर दूंगा।
गुरु वशिष्ठ ने दी यह सलाह
ऋषि दुर्वासा की बात सुनने के बाद लक्ष्मण जी के पास कोई विल्कल नहीं बचा और वह यमराज और श्रीराम की गुप्त बातचीत के दौरान कक्ष में प्रवेश कर गए। यमराज अपने असली रूप में थे, और लक्ष्मण जी के कक्ष में आते ही वह अंतर्धान हो गए। अपने वचन के अनुसार, राम जी को लक्ष्मण को मृत्युदंड देना था, तब उन्होंने ऋषि वशिष्ठ से सहायता मांगी। तब ऋषि वशिष्ठ ने उन्हें सलाह दी कि वह लक्ष्मण का त्याग कर उन्हें राज्य से बाहर भेज दें, जो उनके लिए मृत्युदंड के समान ही है।

(Picture Credit- AI Generated)
गुरु वशिष्ठ की सलाह पर श्रीराम ने लक्ष्मण का "परित्याग" कर दिया। तब लक्ष्मण जी ने इस बात को स्वीकार करते हुए सरयू नदी में जल समाधि ले ली। यह घटना प्रभु श्रीराम के 'मर्यादा पुरुषोत्तम' होने को भी सिद्ध करती है। क्योंकि भगवान श्रीराम ने अपने वचन और मर्यादा की रक्षा के लिए अपने भाई लक्ष्मण को मृत्युदंड के समान ही दंड दिया था।
यह भी पढ़ें- Sunderkand Path: मंगलवार के साथ-साथ इस दिन भी लाभकारी माना गया है सुंदरकांड का पाठ
यह भी पढ़ें- किस श्राप की वजह से भगवान राम को जाना पड़ा था वनवास? जानिए इसके पीछे की कहानी
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।
देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।