सूरज ढलने के बाद भोजन क्यों नहीं करते जैन धर्म के लोग? 3 नियमों में छिपी है इसकी वजह
जैन धर्म में सूर्यास्त के बाद भोजन न करने का नियम अहिंसा के सिद्धांत और स्वास्थ्य लाभों पर आधारित है। यह सूक्ष्म जीवों को नुकसान से बचाने और पाचन तंत् ...और पढ़ें

जैन धर्म में सूर्यास्त के बाद भोजन क्यों नहीं करते (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
अहिंसा के सिद्धांत के कारण रात्रि भोजन वर्जित।
सूक्ष्म जीवों को नुकसान से बचाने के लिए नियम।
पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने में सहायक है यह नियम।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सभी धर्मों की तरह जैन धर्म की भी अपनी कुछ शिक्षाएं हैं जिनका अलग महत्व है। उसी तरह से इस धर्म के कुछ जरूरी नियम भी हैं जिनका पालन करना जरूरी माना जाता है। ऐसे ही एक नियम है जैन धर्म के लोगों का सूर्यास्त के बाद भोजन न करना। इस धर्म के अनुयायी ऐसा मानते हैं कि अहिंसा के एक सिद्धांत के कारण सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए।
दरअसल जैन धर्म का मूल सिद्धांत ही है अहिंसा का पालन करना और इसकी वजह से इस धर्म के लोग छोटे से छोटे जीव की भी हत्या नहीं करते हैं। जैन धर्म में दो तरह के अनुयायी हैं जिनमें से एक हैं दिगंबर और दूसरे श्वेताम्बर। दिगंबर वो हैं जो निर्वस्त्र रहते हैं और आकाश को ही अपना वस्त्र मानते हैं।
वहीं श्वेताम्बर वो होते हैं जो सफेद वस्त्र धारण करते हैं और नाक और मुंह को भी कपड़े से ढककर रखते हैं जिससे उनके भीतर कोई भी जीव नाक या मुंह से भी प्रवेश न करे। जैन धर्म में भोजन के इस नियम को लेकर भी कई बातें कही गई हैं। आइए जानें इससे जुड़े कारणों के बारे में।
जैन धर्म के लोग अहिंसा का पालन करते हैं
जैन धर्म का मूल सिद्धांत अहिंसा को माना जाता है यानी उनके किसी भी कार्य द्वारा किसी की भी इंसान, पशु यहां तक कि सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव ही क्यों ना हो उसे नुकसान नहीं होना चाहिए। इसलिए ही जैन लोग रात्रि में भोजन नहीं करते हैं क्योंकि उनका मानना है कि जिन छोटे कीटाणुओं को हम सीधे नहीं देख पाते हैं वो भी रात में तेजी से फैलते हैं और ऐसे में सूर्यास्त के बाद भोजन करने से कोई सूक्ष्म कीटाणु नाक या मुंह के रास्ते भीतर न चला जाए इसलिए वो रात्रि भोजन को ही वर्जित मानते हैं।
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क्या हैं वैज्ञानिक कारण
जैन धर्म के लोगों का रात के समय भोजन न करने का एक और कारण यह भी है कि वो अपनी अच्छी सेहत के लिए इस नियम का पालन करते हैं। रात में देर से भोजन करने से पाचन तंत्र स्वस्थ नहीं रहता है और पाचन शक्ति कमजोर होने लगती है। रात्रि भोजन के बाद तुरंत सो जाना भी सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए पाचन को सुचारु रखने के लिए जैन धर्म के लोग सूरज ढलने से पहले भी भोजन कर लेते हैं।

आचारांग सूत्र में भोजन के नियम
आचारांग सूत्र जैन धर्म के सबसे प्राचीन और मूल धार्मिक ग्रंथों में से एक है जिसमें आचार संहिता यानी भोजन के कई नियमों का वर्णन है। उसकी में एक नियम यह भी है कि इस धर्म के लोगों को हमेशा सात्विक भोजन करना चाहिए और भोजन हमेशा सूर्योदय के बाद और सूर्यास्त के पहले ही ग्रहण कर लेना चाहिए। इसके अलावा, जैन धर्म के लोग भोजन के कुछ और नियमों का पालन भी करते हैं जिसमें 'एकासन' यानी दिन में केवल एक बार बैठकर भोजन करना या 'बियासन' दिन में केवल दो बार भोजन करना जैसे नियमों का भी पालन करते हैं।
वास्तव में सभी जैन धर्म के लोगों का एक मात्र उद्देश्य अपने धर्म को बढ़ावा देने के साथ अहिंसा का पालन करना है और इसी वजह से वो किसी भी ऐसे काम से दूर रहते हैं जिसमें अहिंसा हो सकती है।
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