Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    सतुआनी पर्व पर आधुनिकता की छाया, सत्तू की सोंधी खुशबू से दूर होती परंपरा, अमूल्य सांस्कृतिक विरासत पर संकट

    Updated: Mon, 13 Apr 2026 05:12 PM (IST)

    14 अप्रैल को सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के साथ सतुआनी पर्व मनाया जाएगा। यह पर्व कभी प्रकृति से जुड़ाव और आयुर्वेदिक परंपरा का प्रतीक था, लेकिन आधुनि ...और पढ़ें

    सतुआनी पर्व पर संकट, सत्तू और परंपरा से दूर हो रही नई पीढ़ी

    सतुआनी पर्व पर संकट, सत्तू और परंपरा से दूर हो रही नई पीढ़ी

    HighLights

    1. सतुआनी पर्व पर आधुनिकता का बढ़ता प्रभाव।

    2. पारंपरिक महत्व और आयुर्वेदिक लाभ हो रहे अनदेखा।

    3. सांस्कृतिक विरासत को बचाने की तत्काल आवश्यकता।

    संवाद सूत्र, सिमुलतला (जमुई)। समय का पहिया लगातार घूमता है, ऋतुएं बदलती हैं और उसके साथ बदलती हैं हमारी परंपराओं की रंगत भी। 14 अप्रैल, मंगलवार को सूर्य देव मेष राशि में प्रवेश करेंगे। पंचांग के अनुसार इसी दिन सतुआनी पर्व मनाया जाएगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या आज भी वह पारंपरिक उल्लास और सादगी लोगों के जीवन में लौट पाती है, जो कभी गांवों की गलियों में सत्तू की सोंधी खुशबू बनकर बिखरती थी।

    बदलते समय में फीकी पड़ती परंपराएं

    आधुनिकता की चकाचौंध ने हमारी जीवनशैली को तो बदला ही है, साथ ही कई पुरानी परंपराओं को भी पीछे छोड़ दिया है। सतुआनी केवल एक पर्व नहीं था, बल्कि प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर जीने की एक जीवनशैली थी।

    वयोवृद्ध गोविंद सिंह लाला बताते हैं कि पहले इस पर्व पर मिट्टी के घड़ों का विशेष महत्व होता था और सत्तू के प्रसाद में एक अलग ही श्रद्धा देखने को मिलती थी, जो अब धीरे-धीरे कम होती जा रही है।

    आयुर्वेदिक परंपरा से जुड़ा पर्व

    परंपरागत रूप से यह पर्व शरीर को गर्मी के लिए तैयार करने का माध्यम भी माना जाता था। ज्येष्ठ की तपती दोपहरों से पहले सत्तू और आम के टिकोरे जैसे खाद्य पदार्थों का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता था। यह हमारी आयुर्वेदिक विरासत का हिस्सा रहा है, जिसे आज की नई पीढ़ी अक्सर नजरअंदाज कर देती है।

    खबरें और भी

    ज्योतिषीय दृष्टि से महत्वपूर्ण दिन

    व्याकरणाचार्य कामेश्वर पांडे के अनुसार, सूर्य देव इस दिन मीन राशि से मेष राशि में प्रवेश करेंगे। यह खगोलीय परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस परिवर्तन के साथ ही एक माह से रुके हुए सभी शुभ और मांगलिक कार्यों पर लगा विराम भी समाप्त हो जाएगा।

    दान और परंपरा का महत्व

    परंपरागत रूप से इस दिन नए मिट्टी के बर्तन में जल भरकर, उसमें सत्तू और गुड़ अर्पित कर भगवान को भोग लगाया जाता है। साथ ही सत्तू, पंखा और जल से भरे घड़े का दान करने की परंपरा रही है, जिससे राहगीरों और जरूरतमंदों को गर्मी से राहत मिलती थी।

    बदलता सामाजिक व्यवहार

    आज के समय में दान और पर्व मनाने का स्वरूप भी बदल गया है। अब कई जगहों पर यह परंपरा केवल औपचारिकता तक सीमित रह गई है। वयोवृद्ध मदन पंडित कहते हैं कि अब नई पीढ़ी को न तो सत्तू बनाने की विधि पता है और न ही इन पर्वों के पीछे का वास्तविक अर्थ समझ में आता है।

    विरासत बचाने की जरूरत

    सवाल यह है कि क्या हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को केवल तस्वीरों और यादों तक सीमित कर देंगे या उसे जीवित रखेंगे? सतुआनी हमें यह याद दिलाती है कि हमारी जड़ें मिट्टी से जुड़ी हैं। कल जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करेगा और आप सत्तू का सेवन करेंगे, तो यह भी सोचिए कि क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक समृद्ध परंपरा सौंप रहे हैं या केवल एक फीका इतिहास।