श्रीमगद्भगवद्गीता में बताए 2 सबसे बड़े महापाप क्या हैं? जानिए श्रीकृष्ण से बचाव के उपाय
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमगद्भगवद्गीता में दो ऐसे महापापों के बारे में बताया है, जो मनुष्य का नाश तक कर सकते हैं. ...और पढ़ें

श्रीकृष्ण से जानिए गीता में सबसे बड़ा पाप (Picture Credit: AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू शास्त्रों और पुराणों बताया गया है कि, व्यक्ति अपने जीवन जो भी अच्छे या बुरे कर्म करता है, मरने के बाद उसे उन सभी कर्मों का हिसाब देना पड़ता है, जिसके आधार पर उसे सजा या फिर से पुनर्जन्म मिलता है।
ईश्वर की दृष्टि में आप जो भी अच्छे काम करते हैं, वो आपके पुण्य कहलाते हैं, जबकि गलत कार्य करने पर आप पाप के भागीदारी बनते हैं। आइए जानते हैं भगवान श्रीकृष्ण ने ऐसे कौन-से दो महापापों का जिक्र किया है, जिसे करने से व्यक्ति का नाश तक हो सकता है?
गरुड़ पुराण जैसे धार्मिक ग्रंथों इन का जिक्र
गरुड़ पुराण, श्रीमगद्भगवद्गीता और कठोपनिषद् जैसे ग्रंथों में साफ-साफ लिखा है कि, वासना और गुस्सा करने से रजोगुण उत्तपन्न होता है, जो महापाप की श्रेणी में आते हैं। श्रीकृष्ण ने इन दोनों चीजों को महाशान यानी सब कुछ खा जाने वाला बताया है, क्योंकि ये इंसान की सोचने-समझने की क्षमता को भ्रमित कर देते हैं, जिससे वह अधिक पाप करता है।
श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय (कर्मयोग) के श्लोक 37 में कहा कि-
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।।
मतलब- श्रीकृष्ण ने कहा है कि, हे अर्जुन! रजोगुण से उत्पन्न होने वाला यह काम (इच्छा/वासना) ही बाद में गुस्से में बदल जाती है। जो व्यक्ति की बुद्ध पर नकारात्मक असर दिखाती है, जिसकी वजह से वह ज्यादा से ज्यादा पाप करता है।
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इन 2 पापों से बचें कैसे?
गीता के श्लोक 3.39 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि, काम (इच्छा या वासना) और क्रोध को ज्ञानी व्यक्ति का सबसे बड़ा शत्रु माना जाता है। व्यक्ति के इंद्रियों, मन और बुद्धि में काम वास करती है।
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को सलाह देते हुए कहते हैं कि, जो काम मनुष्य को पाप और विनाश की ओर अग्रसर करें, इन्हें काबू करना ही सच्चे कर्मयोगी का काम है।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि, ज्ञान की नाव में बैठकर आसानी से रजोगुण के सागर को पार किया जा सकता है। इसके अलावा भगवान की शरण में जाने से और नाम जप करने से भी सभी तरह के पापों से छुटकारा मिलता है।
भौतिक जगत यौन सुख का स्थान- मनुस्मृति
मनुस्मृति जैसे धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है कि, कामवासना को किसी भी मात्रा में इंद्रिय सुख से संतुष्ट नहीं किया जा सकता। इस भौतिक जगत में समस्त गतिविधियों का केंद्र बिंदु कामवासना है, इसी वजह से संसार को मैथुन्य आगार (यौन सुख का स्थान) कहा जाता है।
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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।