दत्तात्रेय का उपदेश: अग्नि से सीखें जीवन के गूढ़ रहस्य, बुराइयों के बीच रहकर भी कैसे रहें पवित्र?
अवधूत भगवान दत्तात्रेय ने अपने 24 गुरुओं की शृंखला में 'अग्नि' को गुरुपद पर प्रतिष्ठित कर यह सिद्ध किया कि ...और पढ़ें

दिव्यता का प्रतिमान और आध्यात्मिक मार्गदर्शक
आचार्य नारायण दास, भागवताचार्य महंत, (श्रीभरतमिलाप आश्रम, मायाकुंड, ऋषिकेश)। महाराज यदु को उपदेश देते हुए दत्तात्रेय कहते हैं- "हे राजन्! अग्नि के माध्यम से मैंने आत्मिक अभ्युदय हेतु अत्यंत गूढ़ एवं व्यावहारिक शिक्षाओं को आत्मसात किया है, जो कि आध्यात्मिक दीप्ति और तप का स्वरूप है-
तेजस्वी तपसा दीप्तो दुर्धर्षोदरभाजनः ।
सर्वभक्षोऽपि युक्तात्मा नादत्ते मलमग्निवत् ।।
हे राजन! अग्नि ऊर्जा, ऊष्मा और प्रकाश की ऐसी दिव्यज्योति है, जो सर्वभक्षी होकर भी स्वयं को कभी कलुषित नहीं होने देती। अग्नि का प्रथम गुण उसकी तेजस्विता है। साधक के लिए यह संकेत है कि वास्तविक ओज बाह्य आडम्बरों से नहीं, अपितु कठोर साधना, इंद्रिय संयम और तपस्या की अग्नि से समुद्भूत होता है। तपस्वी का व्यक्तित्व ही समाज में अमिट प्रभाव को अंकित करता है।
अग्नि को परास्त करना असंभव है। एक छोटी चिनगारी भी अनुकूल परिस्थिति पाते ही दावानल बनने का सामर्थ्य रखती है। जीवन के संघर्षों और प्रतिकूलताओं में विचलित हुए बिना अपने आत्मबल को प्रज्वलित रखना ही साफल्य का मार्ग है।
हे राजन! अग्नि का एक विशिष्ट स्वभाव उसकी सर्वभक्षकता है। वह जो कुछ भी ग्रहण करती है, उसे भस्म कर देती है, किंतु उसके दोषों को स्वयं में धारण नहीं करती। संसार में विचरण करते हुए मनुष्य को विविध परिस्थितियों, व्यक्तियों और अनुभवों का सामना करना पड़ता है। अग्नि से प्रेरणा लेकर साधक को चाहिए कि वह जगत के व्यवहारों को तो स्वीकार करे, किंतु उनकी नकारात्मकता और विकारों को अपने चित्त में स्थान न दे।
मान-अपमान और सुख-दुःख
मान-अपमान और सुख-दुःख के द्वंद्वों के मध्य निर्लिप्त रहना ही अंत:करण की शुद्धि का परम सोपान है। जिस प्रकार अग्नि अशुद्धियों को जलाकर भी स्वयं पावन बनी रहती है, वैसा ही चित्त एक योगी का होना चाहिए।
हे राजन! अग्नि का स्वरूप अत्यंत रहस्यमयी है, वह काष्ठ और पाषाण में प्रसुप्त रहती है, किंतु घर्षण मात्र से प्रदीप्त होकर दृश्यमान हो जाती है। यह तथ्य परमात्मा की सर्वव्यापकता का दिग्दर्शन कराता है। ईश्वर सर्वत्र विद्यमान है, परंतु अज्ञान के तिमिर के कारण दृष्टिगोचर नहीं होता। जब साधक ज्ञान, भक्ति और विवेक के माध्यम से अपने अंतःकरण का मंथन करता है, तब वही परमेश्वर अनुभव की वेदी पर प्रत्यक्ष प्रकट हो जाता है।
अग्नि उपासना का अंग है
अग्नि उपासना का एक अंग है, लोकिन जिसका अर्थ केवल कर्मकाण्ड तक सीमित नहीं है, अपितु अग्नि के दैवी गुणों जैसे- तप, तेज, पवित्रता और अनासक्ति को जीवन में उतारना है। अग्नि अर्पणकर्ता के संचित और वर्तमान अशुभ कर्मों को भस्म कर देती है। यह साधना का विशुद्ध पक्ष है। जिस प्रकार अग्नि में आहुति देते ही सबकुछ भस्म हो जाता है, उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान और अनन्य भक्ति की ज्वाला में मनुष्य की वासनाएं, पाप और संचित दोष विलीन हो जाते हैं।
हे राजन्! अग्नि को गुरु स्वीकार कर प्राप्त की गई यह शिक्षा मानव को एक दिव्य जीवन-पथ प्रदान करती है। यह हमें तेजस्वी बनने, आपदाओं में अडिग रहने और संसार में रहते हुए भी कमलवत निर्लिप्त रहने का बोध कराती है। यदि मनुष्य इन शाश्वत सत्यों को आचरण में ढाल ले, तो वह स्वयं प्रकाशित होकर समाज के लिए आलोक-स्तंभ बन जाएगा। अपनी ऊर्जा को नैतिकता और पवित्रता के साथ जोड़ देना ही वास्तविक योग है, जो व्यक्ति और समष्टि दोनों के लिए मंगलकारी है।
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