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    सिर्फ 'नारायण-नारायण' ही नहीं, भारतीय ज्ञान परंपरा के असली आधार स्तंभ हैं नारद जी; पढ़ें अनसुने पहलू

    By Jagran NewsEdited By: Shraddha Pandey
    Updated: Mon, 27 Apr 2026 03:00 PM (IST)

    अज्ञानतावश हम देवर्षि नारद जी को कलहप्रिय एवं झगड़ा कराने वाला निरूपित कर देते हैं, किंतु वे भगवान की मंगलमयी विभूति हैं। ...और पढ़ें

    नारद मुनि: दासी पुत्र से 'देवर्षि' बनने का सफर

    नारद मुनि: दासी पुत्र से 'देवर्षि' बनने का सफर

    HighLights

    1. नारद का अर्थ है ज्ञान देने वाला

    2. नारद जी भारतीय ज्ञान परंपरा के आधार हैं

    3. उन्हें 'झगड़ा कराने वाला' कहना एक अज्ञानता है

    आचार्य मिथिलेशनंदिनीशरण, (सिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास, अयोध्या)। सभारतीय ऋषि-परंपरा विश्वकल्याण को चिंतन के केंद्र में रखती है। विश्व को ब्रह्म की ही अभिव्यक्ति मानने से यह भाव सुसंगत एवं पुष्ट होता है। अतः चारों युगों के काल-प्रवाह में जो ऋषि-परंपरा हमारे सम्मुख होती है, वह सबके मांगल्य की प्रार्थना करती है।

    इन ऋषियों के भी स्वरूप के अनरूप कुछ भेद दृष्टिगत होते हैं, जैसे - देवर्षि, ब्रह्मर्षि अथवा राजर्षि। देवर्षि के रूप में नारद जी सुविख्यात हैं। भगवान श्रीहरि के अनन्य भक्तों में कुछ प्रमुखतम, जिनको महाभागवत कहा गया है, उनमें नारदजी एक हैं-

    “प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक…एतानहं परमभागवतान्नमामि॥” ज्ञान-भक्ति एवं वैराग्य के मूर्तिमान स्वरूप श्रीनारद जी को संपूर्ण आर्ष वांगमय में विशेष महत्व प्राप्त है। उनके स्वरूप का निरूपण नाम के आधार पर करते हुए कहा गया है कि - ददाति नारं ज्ञानं च बालकेभ्यश्च बालकः। जातिस्मरो महाज्ञानी तेनेयं नारदाभिधः अर्थात अबोध जनों को ज्ञान देने वाले और स्वयं सर्वथा बालकवत निरभिमान रहने वाले, अनेक जन्मों का स्मरण रखने वाले परम ज्ञानी होने से ये नारद कहलाते हैं।

    ‘नार’ का अर्थ है ज्ञान, सबको ज्ञान का प्रसाद बांटने से नारद कहलाए, ऐसा भी कहा जाता है। लोकपितामह ब्रह्मा जी के मानस-पुत्र के रूप में जन्म लेने वाले श्रीनारद जी वस्तुतः भगवान की मंगलमयी विभूति ही हैं, जो जगत्कल्याण हेतु समस्त समय एवं स्थानों में स्वच्छंद विचरण करते हैं।

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    नारद जी की उपदेश-पद्धति

    नारद जी की उपदेश-पद्धति पर ध्यान देन से अनुभव होता है कि संपूर्ण भारतीय वांगमय का जो आधारभूत ज्ञान है, वह सब श्रीनारद जी से प्रवाहित है। वेदावतार श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण का उपदेश मुनि वाल्मीकि को श्रीनारद जी ने ही किया-‘नारदं परपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवम्॥’इसी प्रकार श्रीवेदव्यास महर्षि को श्रीमद्भागवत महापुराण रचने की प्रेरणा भी श्रीनारद जी ने ही की। इस संदर्भ में एक विशेष महत्व की कथा ध्यान देने योग्य है।

    महर्षि व्यास अनेक पुराणादि की रचना करके भी कृतकृत्यता का अनुभव नहीं कर रहे थे, उनमें परम शांति का अभाव था। वे अपने आश्रम में चिंतनशील बैठे थे, उसी समय वहां श्रीनारद जी पधारे। महर्षि वेदव्यास ने अपने हृदय की बात नारद जी से निवेदन करते हुए अपनी अशांति का कारण पूछा। श्रीनारद जी ने कहा कि ‘हे मुनिवर ! आपने जिस प्रकार धर्म-अर्थ तथा कामादि पुरुषार्थों की सिद्धि के लिए शास्त्र निरूपित किए हैं, उस प्रकार श्रीभगवान का लोकपावन गुणगान नहीं किया।’

    यद्यपि व्यास जी बारंबार भगवान का चरित्र गाया था, किंतु वह भिन्न-भिन्न संदर्भों में था। श्रीनारद जी ने कहा कि समस्त पुरुषार्थों के साधन से स्वतंत्र केवल भगवान के लिए भगवान के मनोभिराम चरित्र को गाइए। भक्ति ही अनंत जन्मों के संचित मल का प्रक्षालन करके जीव को भगवान के समीप ले जाती है। यह सिद्धांत स्पष्ट करते हुए श्रीनारद जी ने वेदव्यास महर्षि को अपने पूर्वजन्म का वृत्तांत सुनाया है।

    नारद जी ने बताया है कि पूर्वजन्म में मैं एक दासी का पुत्र था, बाल्यकाल में ही संतों का संग मिल जाने के कारण मेरी वृत्ति भगवत्पारायण हो गई। उन्हीं संतों के उपदेश से भगवान के मंत्र का जप करते हुए उनके दर्शन किए। भक्ति से रीझने वाले भगवान ने मुझे अपने पार्षदों में स्थान दिया, यह भक्ति का ही फल है। इस प्रकार श्रीमद्भागवत महापुराण के उपदेष्टा भी श्रीनारद जी हैं। ज्ञान-परंपरा के शीर्ष इन पुरुषों के बाद हम देखते हैं कि भक्ति-परंपरा के दो उज्ज्वल नक्षत्र श्रीध्रुव जी एवं श्रीप्रह्लाद जी दोनों ही श्रीनारद जी के शिष्य हैं।

    श्रीनारद जी महाराज के उपदेश और उनके ज्ञानात्मक स्वरूप के प्रमाणभूत नारद भक्ति सूत्र, नारद पुराण, नारद स्मृति तथा नारद पांचरात्र जैसे वांगमय हमारे समक्ष हैं। नारद जी की सर्वहितैषिता एवं उनकी सर्वजनप्रियता उन्हें सबसे विलक्षण बनाती है। श्रीरामचरितमानस की पंक्ति - ‘निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध।’का साक्षात्कार श्रीनारद जी के जीवन-चरित में होता है। संगीत के द्वारा भगवान की आराधना करते हुए नारद जी वीणा वादन करते हुए नित्य हरि नाम संकीर्तन करते रहते हैं। उनकी निष्कपट संवादशीलता एवं सर्वत्र गति को देखते हुए पत्रकारिता के आदर्श के रूप में भी उनका उल्लेख किया जाने लगा है।

    देवर्षि नारद जी का जीवन

    यद्यपि इसका देवर्षि नारद जी के जीवन से कोई संबंध नहीं है। देवर्षि नारद जी को कलहप्रिय अथवा झगड़ा कराने वाला कहने की भी लोकभ्रांति देखी-सुनी जाती है, यह वस्तुतः अज्ञानमूलक है। तत्वदर्शी होने के कारण नारद जी के चित्त में कोई द्वंद्व संभव ही नहीं है, अतः कलह का कोई अवकाश ही नहीं। वस्तुतः नारद जी का ज्ञान-वैराग्य, उनकी भक्ति, उनकी सरलता, उनकी सदैव प्रसन्नता तथा संवादशीलता ऐसे गुण हैं, जो लोक में उनको सर्वाधिक प्रिय बनाते हैं।

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