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    सनातन वैदिक धरोहर का दिव्य आयाम: विष्णु अवतार के रूप में भगवान बुद्ध

    By Jagran NewsEdited By: Vaishnavi Dwivedi
    Updated: Mon, 27 Apr 2026 02:39 PM (IST)

    गौतम बुद्ध ने भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रयोग मार्ग को अपनाया, प्रमाण मार्ग को नहीं। दोनों का एक ही लक्ष्य है मोक्ष या निर्वाण की प्राप्ति। बुद्ध का उपद ...और पढ़ें

    बौद्ध दर्शन का महासागर: आचार्यों की परंपरा और प्रज्ञापारमिता का वैश्विक विस्तार।

    बौद्ध दर्शन का महासागर: आचार्यों की परंपरा और प्रज्ञापारमिता का वैश्विक विस्तार।

    प्रो. श्रीनिवास वरखेडी कुलपति (केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली)। बुद्ध पूर्णिमा केवल एक ऐतिहासिक स्मरण का दिवस नहीं, अपितु भारतीय आध्यात्मिक चेतना के सातत्य, समन्वय और सार्वभौमिक करुणा के उद्घोष का पावन अवसर है। इस दिन हम भगवान बुद्ध के जन्म, ज्ञानप्राप्ति और महापरिनिर्वाण इन तीनों महत्वपूर्ण घटनाओं का एक साथ स्मरण करते हैं। भारतीय परंपरा में बुद्ध केवल बौद्ध धर्म के प्रवर्तक नहीं, बल्कि सनातन वैदिक धरोहर के एक दिव्य आयाम के रूप में प्रतिष्ठित हैं। पुराणों में उन्हें भगवान विष्णु के अवतार के रूप में स्वीकार किया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि बौद्ध और जैन परंपराएं भारतीय आध्यात्मिक परिपाटी से पृथक नहीं, बल्कि उसी के व्यापक, समावेशी स्वरूप की अभिव्यक्ति हैं।

    भारतीय ज्ञान परंपरा में साधना के दो प्रमुख मार्ग माने गए हैं-प्रमाण मार्ग और प्रयोग मार्ग। प्रमाण मार्ग में वेद, उपनिषद्, स्मृतियों और शास्त्रों के आधार पर तत्वज्ञान प्राप्त कर साधक क्रमशः आत्मसाक्षात्कार की ओर अग्रसर होता है। इसके विपरीत, प्रयोग मार्ग में साधक प्रत्यक्ष अनुभव और साधना से प्रारंभ करता है और अनुभवजन्य सत्य के आधार पर ज्ञान की प्राप्ति करता है। भगवान बुद्ध ने मुख्यतः प्रयोग मार्ग को अपनाया, किंतु यह समझना आवश्यक है कि ये दोनों मार्ग परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक ही लक्ष्य, मोक्ष या निर्वाण की प्राप्ति के पूरक साधन हैं। इस प्रकार बुद्ध का उपदेश भारतीय साधना परंपरा की ही एक विशिष्ट अभिव्यक्ति है।

    बुद्ध के उपदेशों का केंद्रीय तत्व प्रज्ञा और करुणा का अद्वैत समन्वय है, जिसका सर्वोच्च प्रतिपादन प्रज्ञापारमिता साहित्य में मिलता है। यह साहित्य बौद्ध दर्शन का हृदय है, जो बोधिसत्व-मार्ग की संपूर्ण साधना-पद्धति को निरूपित करता है। इसमें प्रतिपादित ‘शून्यता’का अर्थ नास्तिक निषेध नहीं, बल्कि समस्त धर्मों की स्वभावशून्यता- अनुत्पन्नता, अनिरोधता और निर्भेदता का तात्विक बोध है। यह बोध करुणा से अभिन्न है; प्रज्ञा के बिना करुणा अज्ञानमूलक हो जाती है और करुणा के बिना प्रज्ञा शुष्क बौद्धिकता में परिवर्तित हो जाती है। अतः प्रज्ञापारमिता इन दोनों का अद्वितीय समन्वय प्रस्तुत करती है।

    प्रज्ञापारमिता का साधना-पक्ष चित्तोत्पाद से प्रारंभ होता है वह महान संकल्प, जिसमें बोधिसत्व समस्त प्राणियों को दुख से मुक्त करने का प्रण करता है। यहां एक अद्भुत दार्शनिक संतुलन दिखाई देता है। एक ओर समस्त सत्वों के प्रति असीम करुणा और दूसरी ओर यह बोध कि परमार्थतः कोई स्थायी ‘सत्व’नहीं है। यही शून्यता और करुणा का समन्वय बोधिसत्व-मार्ग की आत्मा है। इस साधना का व्यावहारिक रूप पारमिताओं में प्रकट होता है। दान, शील, शांति, वीर्य, ध्यान और प्रज्ञा इनका अभ्यास निष्काम भाव से, शून्यता-बोध के साथ किया जाता है। जब दाता, दान और ग्राही, तीनों की स्वभावशून्यता का अनुभव होता है, तभी ये पारमिताएं साधक को बुद्धत्व की ओर अग्रसर करती हैं।

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    प्रज्ञापारमिता साहित्य का सर्वाधिक विस्तृत और गूढ़ ग्रंथ “शतसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता” है, जो इस संपूर्ण परंपरा का एक विश्वकोशीय स्वरूप प्रस्तुत करता है। इसमें बोधिसत्व-मार्ग, शून्यता-दर्शन, धर्मनैरात्म्य, बुद्धकाय और निर्वाण जैसे सभी तत्वों का अत्यंत गहन और सुविस्तृत विवेचन मिलता है। यह केवल दार्शनिक ग्रंथ नहीं, बल्कि साधना का एक समग्र मानचित्र है। भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात यह ज्ञान परंपरा संघ, बौद्ध परिषदों और महान आचार्यों जैसे नागार्जुन, असंग, वसुबंधु, दिङ्नाग और धर्मकीर्ति के माध्यम से विकसित हुई और भारत से निकलकर संपूर्ण एशिया में प्रसारित हुई। इस प्रकार प्रज्ञापारमिता केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक जीवित वैश्विक चिंतन परंपरा बन गई।

    केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा “शतसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता” का समालोचनात्मक संपादन और 36 खंडों में प्रकाशन किया गया है। अनेक विद्वानों के दलों ने 25 वर्षों के अथक अनुसंधान के आधार पर 16 प्राचीन हस्तलिखित प्रतियों के तुलनात्मक अध्ययन से यह कार्य संपन्न किया गया है। यह न केवल बौद्ध दर्शन के गहन अध्ययन के लिए अमूल्य है, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रामाणिकता और निरंतरता का सशक्त प्रमाण भी है। यह ग्रंथ न केवल बौद्ध अनुयायियों के लिए, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए शांति, करुणा और ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करता है।

    यह “ज्ञान भारतम्” की उस परिकल्पना को भी साकार करता है, जिसमें भारत अपनी प्राचीन ज्ञानधारा को पुनः वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित कर रहा है। अतः बुद्ध पूर्णिमा का यह उत्सव हमें स्मरण कराता है कि भारतीय ज्ञान परंपरा विभाजन नहीं, बल्कि समन्वय की परंपरा है, जहां विविध मार्ग एक ही सत्य की ओर अग्रसर होते हैं। बुद्ध का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। जिसका ध्येय है करुणा, प्रज्ञा और मध्यम मार्ग के माध्यम से मानवता को शांति और मुक्ति की दिशा में अग्रसर करना।

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