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    अभेद में भेद: क्या हम ईश्वर की पूजा कर रहे हैं या अपने अहंकार की?

    By Jagran NewsEdited By: Vaishnavi Dwivedi
    Updated: Mon, 20 Apr 2026 12:43 PM (IST)

    ज्ञान-भाग सिर है, भक्ति-भाग हृदय है और कर्म-भाग हाथ-पांव हैं। जैसे जीवन में तीनों के सामंजस्य से पूर्णता होती है, उसी प्रकार ज्ञान-भक्ति-कर्म स्वरूप व ...और पढ़ें

    अहंकार से अर्पण तक: वेदों के प्रकाश में सृष्टि और सत्य का दर्शन।

    अहंकार से अर्पण तक: वेदों के प्रकाश में सृष्टि और सत्य का दर्शन।

    स्वामी मैथिलीशरण (संस्थापक अध्यक्ष, श्रीरामकिंकर विचार मिशन)। आकाश के नीचे जो शब्द हो रहा है, चाहे वह लिखा जाए, पढ़ा-सुना अथवा बोला जाए, वे शब्द सब आकाश हैं। जितनी भी सुगंध संसार में है, वह सब पृथ्वी है। जितना रस है, वह सब जल से ही है। स्पर्शसुख वायु से ही है। अग्नि केवल सूर्य से है। सारी सृष्टि का निर्माण इन्हीं पांच से हुआ है। अपरा शक्ति में मन, बुद्धि और अहंकार मिलाकर ईश्वर ने इनको सृष्टि निर्माण का उपादान बनाया, जिसको अपरा प्रकृति कहते हैं। ईश्वर की परा प्रकृति सीता और राम स्वयं मिलकर इस अपरा का उपयोग करके ही सृष्टि का निर्माण और संचालन करते हैं। संसार में अनेक दार्शनिक हुए। उन्होंने ईश्वर की अपरा प्रकृति के अनेक भाग इसलिए नहीं किए कि वे अनादि, अनंत और अपौरुषेय वेद से सम्मत नहीं थे, अपितु वे अपनी अपनी निजी बौद्धिक क्षमता से उस प्रकृति को जैसा समझ सके, उन्होंने ईमानदारी से उसको लिखने या समझाने की चेष्टा की। अनुयायियों ने अपनी-अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार उन बौद्धिक शाखाओं को ही अपने लिए आदर्श भी मान लिया।

    आगे चलकर जब दर्शन और दार्शनिकों की दूसरी, तीसरी और अनेक शाखाएं निकलीं तो पूर्व शाखाओं को उनका प्रवेश अप्रिय लगा तथा उनके अहंकार ने एक-दूसरे का विरोध शुरू कर दिया। यह विरोधाभास तात्विक न होकर केवल अहंकार होता है। चाहे वह किसी धर्म प्रचारकों या मानने वालों का हो या दर्शन और दार्शनिक के अनुयायियों का हो। दर्शन अनंत नहीं होता है, न ही दार्शनिक और कोई सिद्धांत। अनंत, अनादि और अपौरुषेय तो केवल वेद हैं। जहां से सारे दर्शन और विचारों का विस्तार हुआ है। सृष्टि स-जन के लिए वेद ही वे विश्वविद्यालय हैं, जिनको विश्व के सभी विद्यालयों में पढ़ाया जाना चाहिए ताकि वेद विश्वविद्यालय में विचारों की व्यापकता और सार्वकालिकता स्थापित तथा प्रचारित हो सके।

    संसार का कोई ऐसा दार्शनिक नहीं हुआ जो पृथ्वी की सत्ता को नकार सके। आकाश, जल, वायु और अग्नि को भी नहीं नकार सकते, मन, बुद्धि और अहंकार को भी नहीं नकार सकते हैं। सारे दार्शनिकों का मूल तो ईश्वर ही है, पर उस मूल की पैकिंग अलग-अलग लोगों ने करके अपने अपने अहंकार के ब्रैंड बना दिए। अब कोई अग्नि की पूजा करने लगा, कोई चंद्रमा की पूजा करने लगा कोई सूर्य की तो कोई सगुण या फिर कोई निर्गुण को ईश्वर बताने लगा। कोई सृष्टि का आधार काम को बताने लगा तो कोई लोभ को आधार बनाकर सृजन की बात करने लगा।

    यदि सूक्ष्मतम, पवित्र और शांत मन:स्थिति में स्थित होकर देखा जाए तो अपने ठंग से सब ठीक कह रहे हैं, पर ठीक केवल स्वयं को ही कह रहे हैं। श्रेष्ठता तक तो सब स्वीकार्य हैं, पर अहंकार कहता है कि हम श्रेष्ठ नहीं, हम तो सर्वश्रेष्ठ हैं। सबसे अच्छा कहलाने की इसी इच्छा का नाम अहंकार होता है। अहंकार सृष्टि के लिए ऐसा सुंदर उपादान है कि यदि इसे अनंत, अनादि और अपौरुषेय भगवान को अर्पित कर दिया जाए और हर रंग दूसरे रंग की विशेषता को स्वीकार ले, हर सुगंध दूसरी सुगंध को सूंघकर सुख ले। अनुयायी ईश्वर द्वारा निर्मित अभेद विषयक भेद को अपने अहंकार की सिद्धि का मंच बना देते हैं। इस कार्य को करने में अपना सर्वस्व लुटाने और बर्बाद करने का ऐतिहासिक कार्य जो करते आये हैं, उनको संज्ञा दी गई है अनुयायी की।

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    अहिंसा वेद में है। सत्य वेद में है। कर्म वेद में है। धर्म और भक्ति वेद में है। मुक्ति, ध्यान, कृपा, करुणा वेद में है, संयम, व्रत, तीर्थयात्रा, शुद्धि सब वेद में है। उन्हीं का उपयोग करके दिखाने के लिए ईश्वर अवतार लेकर सबका कल्याण करता है और संसार में लोग उनके हथियार तो पकड़ लेते हैं, पर उनके चरण और हृदय को छोड़ देते हैं। वैराग्य वेद में है, बोध वेद में है, तो ऐसा कौन-सा दार्शनिक है, जो कुछ नया कर देता है। सृष्टि में नया कुछ है ही नहीं। ईश्वर ने हर पदार्थ और प्रकृति को ऐसा बनाया है, जो चिरपुरातन होते हुए भी नित्य नया है। आकाश नित्य नया। जल नित्य नया, वायु, अग्नि, चंद्रमा, तारे, ग्रह, नक्षत्र, फल, धान्य सारे दार्शनिक तो उसी का गुणगान करते हैं, उन्हीं पुराने पदार्थों का ही तो भोग करते हैं, नया कौन क्या करता है?

    विरोध के स्थान पर यदि स्वीकृति भाव आ जाए तो संसार जिस सुख, शांति, आनंद का अनुभव करेगा वह न पहले कभी थी न है, पर भविष्य में हो सकती है। भक्त प्रगतिशील नहीं, वह स्वीकार करने वाले होते हैं, राक्षस प्रगतिशील होते हैं। लड़ाई भी राक्षस करते हैं, क्योंकि प्रगति भी चाहते हैं और दूसरे की शांति, सुख और आनंद भी नहीं देख सकते हैं। व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने उस अहं को भगवान को समर्पित करे, जो अपने अतिरिक्त किसी को देख नहीं सकता है। सबमें एक ही समाया है। हम दो कैसे हो सकते हैं, बिना पृथ्वी के वृक्ष, धान्य, फल कुछ भी कैसे होगा? जो भी संसार में भेद है, वह भेद ईश्वर ने एक-दूसरे के गुणों को स्वीकार करने और दूसरे के गुणों के प्रति सम्मान करने के लिए किया है, वह भेद-अभेद रूप ईश्वर में समर्पित होने के लिए है।

    विचार पिंजरे में बंद होते ही उस पक्षी की तरह फड़फड़ाता है, जो अपनी स्वतंत्रता के लिए आकाश की मांग करता है। विद्या मुक्ति देती है, पिंजरे में बंद नहीं करती है। सब कुछ ईश्वर से है, ईश्वर में है, ईश्वर ही है। हमें उसने ऐसा सब दिया है, जिससे हम सुखी और आनंदित रहें, पर हमें व्यापक तो होना पड़ेगा। हमें एक दूसरे की अहमियत तो स्वीकारनी ही होगी। यदि यह नहीं कर सके तो हम कोई भी दार्शनिक हों किसी भी दर्शन के अनुयायी हों, हम केवल अपने अहंकार की पूजा करते और कराते रहेंगे, मरते और मारते रहेंगे पर तत-सत-आनंद नहीं हो पाएंगे।

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