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मिट्टी, पत्थर और सोना जिसके लिए एक समान, वही है भगवत प्राप्त, जानें मोरारी बापू के अनमोल विचार

By Jagran NewsEdited By: Vaishnavi Dwivedi
Published: Mon, 13 Apr 2026 01:21 PM (GMT+05:30)

भगवत प्राप्त बुद्धपुरुष में अहंकार, ईर्ष्या, निंदा, द्वेष आदि अवगुण नहीं होते, क्योंकि ये भगवत प्राप्ति में बाधक हैं। हमारे ...और पढ़ें

सच्चे साधु की पहचान क्या है?

सच्चे साधु की पहचान क्या है?

मोरारी बापू, (कथावाचक)। एक बार किसी ने जिज्ञासा की थी कि भगवत प्राप्त व्यक्ति को हम कैसे पहचानें? मैं कभी-कभी कहता हूं कि ईश्वर तो हमें प्राप्त ही है, पहचान भर बाकी है। भगवत प्राप्त बुद्धपुरुष को हम कैसे पहचानें, इसके कुछ सरल सूत्र बताए गए हैं। रामचरितमानस में देव ऋषि नारद ने स्वयं भगवान राम से पूछा है कि साधु के लक्षण बताइए। तब प्रभु कहते हैं स्वयं सरस्वती और शेष, जिसके इतने मुख हैं, वह भी भगवत प्राप्त साधु के गुणों का वर्णन नहीं कर सकते। हम जैसे संसारी अभी परिवारजनों को भी ठीक से नहीं पहचान पाए। घर के कुछ पदार्थों को भी नहीं पहचान पाए कि इनकी आवश्यकता है या ये अनावश्यक ही हमारे घर में पड़े हैं। पड़ोसी को नहीं समझ पाते। अरे छोड़िए, खुद तक को हम नहीं पहचान पाते। ऐसे में भगवत प्राप्त व्यक्ति की पहचान कैसे हो?

सद्गुरु दादा (बापू के आध्यात्मिक गुरु त्रिभुवन दास) ने जो पंचसूत्र बताए थे, उनकी आपको याद दिला दूं। दादा कहते थे, पांच वस्तुओं का ध्यान रखना। पहली बात, जहां तक संभव हो किसी भी मूल्य पर, किसी भी कुर्बानी पर सत्य ही बोलना, लेकिन वह सत्य प्रिय रहे, इसका ध्यान रखना। हम संसारी हैं, नहीं निभा पाते लेकिन इतना कठिन भी नहीं है कि हम कर ही ना पाएं। दूसरी बात कही थी, रोज जितना संभव हो, रामचरितमानस का पाठ करो और रोज भगवद्गीता के एक अध्याय का पाठ करो। तीसरी बात कही थी, अहंकार से सावधान रहो। अहंकार कब आ जाए, किस दरवाजे से आ जाए, कोई पता नहीं। तमोगुणी अहंकार तो पकड़ में आ भी जाता है, मगर रजोगुणी को पकड़ना मुश्किल है। मैं इतना पूजा-पाठ करता हूं, यज्ञ करता हूं, जाप करता हूं, यह अच्छी बात है, मगर यह रजोगुणी अहंकार है। मैं किसी का कुछ भी कर दूं, किसी का भी कुछ बिगाड़ दूं, मेरे ऊपर कोई नहीं है, यह सोच तामसी अहंकार है। दादा कहते रहे हैं, अहंकार से सावधान रहना। चौथी बात, जिस पर कथाओं में, बातचीत में निरंतर मैं कहता भी रहता हूं, ईर्ष्या, निंदा, द्वेष से दूर रहिए। पांचवां सूत्र, जितना हो सके मौन रहो और निरंतर हरि स्मरण करो। ये त्रिभुवनीय पंचशील हैं।

भगवत प्राप्ति के लक्षण

भगवद्गीता में भी भगवत प्राप्ति के बहुत से लक्षण बताए गए हैं। हम सरलता से पहचान सकें, ऐसे कुछ परख देने वाले लक्षण भी हैं। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, वह मुझे प्राप्त कर चुका है, जिसमें ये बातें हैं। पहली बात कही- ज्ञान विज्ञान तृप्तात्मा। अर्जुन, जो ज्ञान और विज्ञान से तृप्त हो चुका है। कहीं हमें ज्ञान की तृप्ति नहीं होती। मैं यह जानूं, यह ग्रंथ खोलूं, कोई निर्णय नहीं। ज्ञान की भूख यद्यपि ठीक है, मगर तृप्ति एक और अवस्था का नाम है। विज्ञान से भी जो तृप्त हो गया। मनीषियों ने अनुभवपूर्वक भाष्य किया है। छोटी-सी बात, ज्ञान का अर्थ है योग। विज्ञान को हम प्रयोग कहते हैं। सीधी-सी व्याख्या है। जो योग और प्रयोग से तृप्त हो गया है, वह भगवत प्राप्त व्यक्ति है। न उसे ज्ञान पाना है, ना प्रयोग करना है। हर खोज समाप्त हो चुकी है। हर ज्ञान-विज्ञान विराम ले चुका है। लोग कहते हैं जीवन क्या है, जीवन का उद्देश्य क्या है। जीवन तो हम जी ही रहे हैं, उद्देश्य को छोड़ो और तृप्त हो जाओ।

साधना के क्रम

साधना के क्रम में यह भी स्वीकार्य है, मगर आपने उद्देश्य तय किया और वहां तक नहीं पहुंच पाए तो उद्देश्य भी उदास कर देगा। मैं दिल खोलकर कहूं। इसका कोई संकीर्ण अर्थ नहीं करना। मेरे दादा भगवत प्राप्त व्यक्ति थे। न कोई ज्ञान, न विज्ञान, ना ही प्रयोग की कोई भूख। तृप्त थे। भगवान कृष्ण दूसरा लक्षण कहते हैं कूटस्थ। जो बिल्कुल विकार रहित है। तीन शब्द हैं- कूटस्थ, मध्यस्थ और तटस्थ। बड़ा प्यारा शब्द है कूटस्थ। कूटस्थ वह है, जो न तटस्थ है, ना ही मध्यस्थ। न तट पर खड़ा मार्गदर्शन कर रहा है, ना ही दूध-दही दोनों में खेल रहा है मध्य में रहकर। दोनों अच्छी वस्तु हैं, मगर यह कूटस्थ शब्द बहुत विशेष के लिए लगता है।

भाष्य में लिखा है- विकार रहित। विकार रहित अवस्था का अर्थ कहूं विवेक युक्त अवस्था। मैं सालों से कथा गा रहा हूं। जन्म-जन्म से गा रहा हूं। जन्म-जन्म तक गाते रहना चाहता हूं। मैं कहूंगा वक्ता कूटस्थ होना चाहिए। कभी-कभी लोग अर्थ निकालते हैं। बापू ने किसी को उपदेश दिया, किसी को संदेश दिया, किसी को आदेश दिया। नहीं। आदेश तो वेद देता है, बुद्धपुरुष देता है। उपदेश वेदांत दे सकता है। संदेश हमें भगवद्गीता देती है। मैं केवल संवादक हूं। संवाद करता हूं।

बोलना वक्ता का अच्छा लक्षण है

कूटस्थ वक्ता को चाहिए तीन प्रकार से बोले। जैसे प्रज्ञा पुरुष विनोबाजी ने आचार्य संघ की प्रक्रिया तय की तब तीन सूत्र कहे- निर्भय, निष्पक्ष, निर्वैर। मुझे बहुत पसंद हैं ये। कूटस्थ रहने का मतलब निर्भीकता से बोलना और निर्भीकता बिना सत्य के नहीं आती। मूल भूमि सत्य है। मैं निष्पक्षता से बोलता हूं। निष्पक्ष रहकर बोलना वक्ता का अच्छा लक्षण है। एक निश्चित दूरी, प्रामाणिक दूरी, हितकर दूरी, जिसमें सवः से सर्व का कल्याण हो। निष्पक्षता के लिए चाहिए करुणा। करुणा कभी पक्षपात नहीं करती। वह निष्पक्ष होती है। निर्वैरता आती है प्रेम से। जहां प्रेम है, वहां निर्वैरता होगी।

साधु भी भूमि से जुड़ा है

श्रीकृष्ण बोले- जिन्होंने ठीक से सहज व समझ से अपनी इंद्रियों को जीता है, वह भगवत प्राप्त बुद्धपुरुष है। आप जानते हैं जीतना शब्द मुझे इतना रुचिकर नहीं है। किसी को भी जीतना मेरे स्वभाव के अनुकूल नहीं है। शब्द आया है- विजितेंद्रियः। मैं कहूंगा जिसने मूल पांच इंद्रियों को विवेक से भर दिया है। दृष्टि में विवेक, बोली में विवेक, श्रवण में विवेक, स्पर्श में विवेक और सुगंध रस का विवेक। आगे कृष्ण कहते हैं- वह योगी जो मिट्टी को, सोने को, पत्थर को सम दृष्टि से देखता है। ये तीनों भूमि से जुड़े हैं। साधु भी भूमि से जुड़ा है।

मिट्टी रजोगुण है, पत्थर तमोगुण है और सोना सतोगुण है। भगवत प्राप्त व्यक्ति तीनों गुणों से ऊपर उठ जाता है। ऐसा व्यक्ति किसी भी लिबास में क्यों ना हो, कहीं भी रहने वाला क्यों ना हो, किसी भी धर्म का क्यों ना हो, किसी भी तरह से बंदगी क्यों ना करता हो, किसी भी जाति का क्यों ना हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है।

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