भीतर भी वही, बाहर भी वही: आध्यात्मिक चेतना और आकाश की गुरु-दीक्षा
भगवान दत्तात्रेय ने आकाश को अपना गुरु मानकर जो शिक्षा ग्रहण की है, वह परमसत्य की ओर ले जाती है और जीवन प्रबंधन का आधार प्रस्तुत करती है कि विस्तार ही ...और पढ़ें

मानसिक दीवारों को तोड़िए: दत्तात्रेय उपदेश और असीमित अस्तित्व का बोध।
महाराज यदु से अपने 24 गुरुओं की व्याख्या करते हुए, भगवान दत्तात्रेय उपदेशित करते हैं, हे राजन! जैसे पृथ्वी और वायु मेरे गुरुतुल्य हैं, उसी प्रकार आकाश को गुरु मानकर, उससे अद्वैत, वैराग्य और असंगता की शिक्षा ग्रहण की है।
अंतर्हितश्च स्थिरजंगमेषु ब्रह्मात्मभावेन समन्वयेन।
व्याप्त्याव्यच्छेदअसंगमात्मनो मुनिर्भभस्त्वं विततस्य भावयेत्॥
जिस प्रकार आकाश चर और अचर जड़-चेतन सभी वस्तुओं के भीतर व्याप्त है, फिर भी वह अखंड और असंग रहता है, उसी प्रकार साधक को भी समझना चाहिए कि परमात्मा सबके भीतर है, किंतु वह किसी से बंधा हुआ नहीं है। हे राजन! दार्शनिक और तात्विक दृष्टि से आकाश सबसे सूक्ष्म महाभूत है। यहां सूक्ष्मता से तात्पर्य है कि चर-अचर में अंदर-बाहर सर्वत्र विद्यमान है। जैसे एक घड़े के भीतर भी आकाश है और बाहर भी, वैसे ही परमात्मा ब्रह्म इस चराचर जगत के स्थिर पहाड़ और वृक्षादि तथा और जंगम में अर्थात मनुष्य और पशु आदि में अंतर्निहित है। आध्यात्मिक साधक को यह अभ्यास करना चाहिए कि किसी वस्तु आदि बाह्य आकार न देखे, अपितु ऊपरी उसके अंतर्निहित सत्य को देखे और अनुभव करे जो सबमें समान है।
शारीरिक और भौतिक रूप से हम सब अलग-अलग दिखते हैं, लेकिन आकाश कभी बंटता नहीं। जैसे हम किसी घर के कक्ष में बैठे हैं, तो हम कहते हैं कि यह मेरे कमरे का आकाश है और घर के बाहर, महाकाश है। वस्तुतः दीवार आकाश को काट नहीं सकती, अपितु भ्रमित करती है। शरीर की सीमाएं आत्मा को विभाजित नहीं कर सकतीं। एक साधक अपनी चेतना को उस महा-आकाश की तरह विस्तृत करना चाहिए, जिसे सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है। हे राजन! आकाश की सबसे बड़ी विशेषता उसकी असंगता है। वह सब कुछ धारण करता है, पर किसी में लिप्त नहीं है। जैसे आकाश में धूल उड़ती है, धुआं होता है, सुगंध और दुर्गंध फैलती है, पर आकाश कभी मलिन नहीं होता है? वह सदा अपनी पवित्रता और शून्यता को बनाए रखता है। हे राजन! साधक का मन भी ऐसा ही होना चाहिए। संसार के विषयों सुख, दुःख, मोह और क्रोधादि के मध्य के बीच रहते हुए भी, उसका अंतःकरण उनसे अलिप्त रहे। वह संसार में तो हो, पर संसार उसमें न हो।
भगवान दत्तात्रेय ने आकाश को अपना गुरु मानकर जो शिक्षा ग्रहण की है, वह परमसत्य की ओर ले जाती है, विस्तार ही जीवन है और संकुचन ही मृत्यु। आज का मनुष्य भौतिक सीमाओं और मानसिक आग्रहों के छोटी-छोटी दीवारों में कैद है। वह अपनी उपलब्धियों, अपने पदों और अपने अहंकार की दीवारों को ही अपना संपूर्ण अस्तित्व मान बैठा है। किंतु जिस क्षण हम विवेक के झरोखे खोलकर देखते हैं, हमें ज्ञात होता है कि हम इन दीवारों से बंधे और घिरे घटाकाश नहीं, बल्कि वह अनंत महा-आकाश हैं, जिसकी कोई सीमा नहीं है।
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संसार के कर्तव्य, कर्म और संबंधों का निर्वहन करते हुए अंतःकरण आकाश की तरह निर्मल, अलिप्त और उदार हो जाएगा, उसी दिन हम सही अर्थों में विमुक्त कहलाएंगे। आकाश में बादल आते-जाते रहते हैं, पर आकाश चिरस्थायी रहता है, क्योंकि वह शाश्वत है। हमारे जीवन में परिस्थितियां बदलती रहेंगी, पर हमारी आंतरिक शांति आकाश की तरह अडिग रहनी चाहिए।