अवसाद से संन्यास तक: जब सब कुछ छिन जाए, तब क्या बचता है? पढ़ें भगवान श्रीकृष्ण का अद्भुत उपदेश
ब्रह्म को न जानने से प्रतिकूल स्थितियों में व्यक्ति को अवसाद होता है, जबकि जान लेने से वह संन्यास को प्राप्त हो जाता है। ...और पढ़ें
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स्वामी मैथिलीशरण: भगवान श्रीकृष्ण के उपदेश
HighLights
ब्रह्म ज्ञान प्रतिकूलता में अवसाद से बचाता है
श्रीकृष्ण ने उद्धव को कथा से वैराग्य समझाया
सब कुछ खोने पर ईश्वर शरण ही मोक्ष का आधार
मी मैथिलीशरण, (संस्थापक अध्यक्ष, श्रीरामकिंकर विचार मिशन)। श्रीमद्भागवत में भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धव को उज्जैन के एक ब्राह्मण की कथा के माध्यम से यह उपदेश प्रस्तुत किया, जो सांख्य योग की पूर्वपीठिका है।
हम आनंद के क्षणों में अपने पुरुषार्थ और योग्यता के साथ अपने पूर्वजन्मों के कर्मों की सराहना करके अपने अहंकार का प्रदर्शन करते हैं, विपरीत परिस्थिति में भी यदि उसे भी पूर्वजन्मों के दुष्कर्मों के परिणाम के रूप में देखें तो वर्तमान में हो रहे विरोधाभासों और बिडंबनाओं से युक्त संसार से न केवल हमारा विरोध नहीं होगा अपितु वही स्थिति भगवान में अनन्य गति मोक्ष का उपादान बन जाएगी।
बार्हस्पत्य स वै नात्र साधुर्वै दुर्जनेरितै:।
दुरुक्तैर्भिन्नमात्मानं य: समाधातुमीश्वर:॥ (एकादश/23/2)
अर्थात हे बृहस्पति-शिष्य इंद्र, जो व्यक्ति दुष्टों द्वारा कहे गए कड़वे या अपमानजनक वचनों से आहत होने के बावजूद अपने मन को संयमित करने में समर्थ हैं, वही वास्तव में साधु है।
कैसा है संसार का स्वभाव
इस संसार में प्राय: ऐसे संत पुरुष दुर्लभ हैं, जो संसार में रहकर भी दुर्जनों की कटुवाणी से बिंधे हुए अपने हृदय को संतुलित रख सके। यह तभी संभव है, जब हृदय में भगवान का निवास हो। यह प्रसंग जीवन के लिए यह बहुत जीवंत है। अधिकाधिक संग्रह हमें बहुत बड़ी विपत्ति में डाल सकता है, यद्यपि हमने उसे अपने चरम पुरुषार्थ से ही क्यों न एकत्रित किया हो। संसार का स्वभाव है कि वह आपके श्रम से कुछ नहीं सीखेगा, अपितु आपकी उपलब्धियों से ईर्ष्या करेगा।
त्रेतायुग और द्वापर की रणभूमि, परिस्थिति और भावभूमि बहुत भिन्न थी, इसके कारण भगवान राम की तुलना में भगवान कृष्ण को उपदेश अधिक देना पड़ा। भगवान श्रीकृष्ण ने जितना ज्ञान कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में अर्जुन को दिया, संक्षेप में उससे भी अधिक ज्ञान अपने दूसरे सखा उद्धव को भाव-भूमि में दिया।
श्रीमद्भागवत के एकादश स्कंध में भगवान श्रीकृष्ण अपने प्रिय सखा, देवगुरु बृहस्पति के शिष्य शुद्ध हृदय श्री उद्धव को सांख्ययोग का दिव्य उपदेश देते हैं।
क्या है वैराग्य
वैराग्य के घनीभूत रूप एक तितिक्षु ब्राह्मण के अलौकिक संदर्भ के द्वारा जीवन में भौतिकता के अतिरेक के पश्चात घोर प्रतिकूलता मिलने के पश्चात भी किस तरह साधक उस परिस्थिति को स्वीकार करता है, भगवान का उद्देश्य परदोषदर्शन से रहित वैराग्य को सुनाकर पहले अपने आत्मीय उद्धव की हृदयभूमि को ज्ञान के स्वरूप को धारण करने के लिए तैयार करना था। उस ब्राह्मण ने अपने घोर पुरुषार्थ से संसार के सारे संसाधन और भोग इकट्ठे कर लिए, पर अंत में संसार के दुष्ट लोगों ने जैसा व्यवहार उसके साथ किया, शायद ही अकारण किसी को इतनी उपेक्षा और दुर्व्यवहार सहना पड़ा हो।
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किंतु उसने सब कुछ सहकर केवल ईश्वर के प्रति शरणागत होकर गुण-दोष से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त कर लिया। सब कुछ नष्ट होने के पश्चात जो बचता है, भक्ति और ज्ञान की दृष्टि से उसी का नाम है वैराग्य। संसारी के जीवन में इसी को अवसाद, विक्षेप या नैराश्य कहा जाता है। अंत में उस तितिक्षु को वैराग्य प्राप्त हुआ और वह व्यष्टि से छूटकर समष्टि में प्रविष्ट हो गया, अनित्य से नित्य में चला गया।
अब भगवान ने सांख्य के सिद्धांत को अत्यंत संक्षेप में प्रस्तुत किया। इसी सांख्य उपदेश के सार भाग को भगवान कपिल ने अपनी मां देवहूति को उपदेश करके मुक्त किया। दसवें स्कंध में भगवान के आदेश पर श्री उद्धव जी ब्रज में जाकर गोपियों के श्रीमुख से भक्ति के मधुर सरितामृत का पान कर चुके थे। वस्तुत: भक्ति के स्राव से ही ज्ञान मूर्तिमान होता है तथा ज्ञान के प्रकाश से भक्ति प्रकाशित और फलित होती है। भगवान को लगा कि मैं अपने प्रिय को वह स्वरूप भी समझा दूं, जिसके कारण वे मुझे और मैं उनको इतना प्रिय मानते हैं।
क्या है मोह का कारण
भगवान द्वारा सांख्य प्रतिपादन का उद्देश्य भेदमूलक सुख-दुख रूपी भ्रम से निवृत्ति है। जगत की उत्पत्ति से पूर्व जीव, जगत, दृश्य, दृष्टा सब कुछ विकल्पशून्य रहता है। केवल ब्रह्म के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता है। ब्रह्म में किसी के मन और वाणी का प्रवेश नहीं है, इसीलिए वह अनिर्वचनीय है। ब्रह्माकार स्थिति में व्यक्ति में क्रोधादि विकार भी संभव ही नहीं हैं। फिर ब्रह्म ही माया और उसमें प्रतिबिंबित दृश्य और दृष्टा रूप में विभाजित हो गया। तब कार्य और कारण दो हो गए। दूसरी वस्तु ज्ञानरूप है।
फिर भगवान ने कहा कि मैंने स्वयं ही सृष्टि विकास के लिए जीवों के कर्मानुसार उस प्रकृति को क्षुब्ध किया। जैसे हम दूध में खटाई डालकर उसे फाड़कर छेना प्रकट करते हैं, दूध को उबालकर खोया प्रकट करते हैं, घी प्रकट करते हैं। दूध के मूल रूप को अप्रकट करके दूसरे रूपों और गुणों को प्रकट करना ही प्रकृति को क्षुब्ध करना है। इस कार्य का आधार अविवेक कदापि नहीं है, अपितु किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए स्व स्वीकृति-विकृति है। इस कारण इस क्षुब्ध को करने से ब्रह्म में कोई विकार नहीं आता है। तदोपरांत उसने माया और जीव रूप धारण कर लिया। फिर प्रकृति से सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण प्रकट होते हैं। जैसे किसी कार्य को करने के लिए उस कार्य को करने का ज्ञान और कार्य करने की शक्ति दोनों चाहिए उसी तरह क्रिया प्रधान सूत्र और ज्ञानशक्ति का प्राकट्य हुआ।
महत्तत्व में विकार होने पर अहंकार व्यक्त हुआ, जो मोह का कारण है। बिना विकृति का आश्रय लिए सृजन संभव ही नहीं है। वस्तुत: विकृति विकार तब कहलाती है, जब वह विकारी के अंदर जाती है। ऋषि कर्दम और उनकी पत्नी देवहूति ने भी काम विकृति का उद्देश्यपरक उपयोग करके कपिल रूप निर्विकार को प्रकट किया। अंत में निर्विकार भगवान कपिल ने अपनी मां को उपदेश दिया। काम, क्रोध, लोभ विकारी के विकार हैं, निर्विकारी के नहीं। ब्रह्म में विकार कहां? वह तो उस निर्विकार का सृजनात्मक संकल्प है।
अहंकार के प्रकार
अहंकार के भी तीन प्रकार होते हैं, सात्विक, राजसिक और तामसिक। इंद्रियों के साथ उनकी तन्मात्रा शब्द, गंध स्पर्श, रूप, रस का कारण मन है, वही प्रत्येक इंद्रियों से भोग भोगता है। तामसिक अहंकार से पंचतंमात्राएं और पंचमहाभूत पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश पैदा हुए। राजस अहंकार से इंद्रियां तथा सात्विक अहंकार से इंद्रियों के अधिष्ठाता ग्यारह देवता- (1) दिशा-कान, ज्ञानेंद्रिय, (2) वायु-त्वचा, ज्ञानेंद्रिय, (३) सूर्य-आंखें,ज्ञानेंद्रिय, (४) वरुण-जीभ,ज्ञानेंद्रिय, (5) अश्विनीकुमार-नाक-घ्राण,ज्ञानेंद्रिय, (6) अग्नि-वाणी,कर्मेंद्रिय, (7) इन्द्र-हाथ, कर्मेंद्रिय, (8) विष्णु-पैर, कर्मेंद्रिय, (9) मित्र- गुदा, कर्मेंद्रिय, (10) प्रजापति-जननांग-उपस्थ, कर्मेंद्रिय, (11) चंद्रमा-मन, अंतर में रहने वाला।
इन सबके एकत्र होने के पश्चात एक अंड बना, जो ईश्वर का निवास है। जहां न सूर्य की, न चंद्रमा न ही अग्नि की सत्ता है। यही ब्रह्म ईश्वर का निवास है। जब यह अंड जल में पहुंच गया, तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं नारायण रूप में प्रकट हो गया। मेरी नाभि से एक कमल प्रकट हुआ। उसी से ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा जी ने तपस्या की और फिर तीन लोक प्रकट हुए।
(१)-भू:, पृथ्वी,- (२)भुव:, अंतरिक्ष-, (३) स्व:, स्वर्ग। फिर देवता स्वर्ग में रहने लगे, भूत प्रेत आदि भुवर्लोक में, भूर्लोक में मनुष्य रहने लगे। इन तीनों के ऊपर महर्लोक सिद्ध, तपस्वियों के लिए बना, जो योग तपस्या संन्यास के द्वारा ही प्राप्त होता है। महर्लोक, जनलोक, तपलोक और सत्यलोक रूप उत्तम लोक है, जो आद्योपांत है, पहले था, अभी है, बाद में भी रहेगा। वही सत् है, सत्य है, ईश्वर है, ब्रह्म है। सृष्टि के लय होते ही जो जहां से आया, वह सब उसी में विलीन हो जाता है।
इसी को जान लेने के पश्चात हानि-लाभ, जीवन-मरण, दुख-सुख, यश-अपयश सब कुछ मिथ्या होकर साधक की वृत्ति भगवताकार हो जाती है। भगवान ने उद्धव को ब्रज भेजकर भक्ति दिखा दी। चलकर गए, यह कर्म हो गया और स्वयं अपने श्रीमुख से ज्ञान देकर उन्हें पूर्ण कर दिया।
कैसे प्राप्त होता है वैराग्य
तितिक्षु ब्राह्मण की कथा से उद्धव को ज्ञानोपदेश का प्रसंग संपूर्ण विराट को समझने की कुंजी है। सब भगवान में आत्मा में लीन हो जाते हैं, पर ब्रह्म किसी में लीन नहीं होता, वह तो सार्वकालिक सत्य है, सदा एकरस है। इसको जानने और न जानने का मात्र एक ही अंतर होता है कि न जानने से प्रतिकूलता आने पर व्यक्ति विक्षेप और अवसाद का ग्रास बनकर ईश्वर विमुख हो जाता है, फिर घोर अंधकूप में चला जाता है और जान लेने से ईश्वर सम्मुख होकर उसकी कृपा का बोध होकर वैराग्य को प्राप्त हो जाता है। यही सांख्य है।