गुरु तेग बहादुर: उत्तर मध्यकाल के वे महापुरुष जिन्होंने 'बोली' को बनाया 'ब्रज भाषा'
नवम गुरु तेग बहादुर जी ने त्याग, सेवा और समरसता के सनातन मूल्यों का पोषण किया और भारतीय दार्शनिक चिंतन में योगदान किया। आज उनके प्रकाशपर्व पर विशेष। ...और पढ़ें

हिंद की चादर गुरु तेग बहादुर।
प्रो. हरमहेंद्र सिंह बेदी (कुलाधिपति, केंद्रीय विश्विद्यालय हिमाचल प्रदेश)। भारतीय अध्यात्म एवं दार्शनिक चिंतन में नवम गुरु तेग बहादुर का विलक्षण अवदान है। उत्तर मध्यकाल की ऐतिहासिक भूमिका को समझने के लिए नवम गुरु के व्यक्तित्व और कृतित्व के प्रति नतमस्तक होने की आवश्यकता है। भारतीय चिंतन की सनातन सुगठित एवं सांस्कृतिक चेतना में नवम गुरु की वाणी हमारा मार्ग दर्शन करती है। गुरु जी ब्रज भाषा (हिंदी) के अद्वितीय वाणीकार थे। यह तथ्य भी गुरु जी की वाणी की भाषिक संरचना को महान बनाता है कि गुरु जी से पहले ब्रज को बोली के रूप में संपूर्ण भारत में जाना जाता था, गुरु जी की वाणी के साथ ही ब्रज बोली ब्रज भाषा बन गई। भारतीय भाषाओं के विकास में इस तथ्य पर भी विचार होना चाहिए क्योंकि एक बोली महापुरुषों के द्वारा जब सर्वोत्तम काव्य भाषा का रूप ग्रहण करती है तो उसका अस्तित्व गरिमामय बन जाता है।
गुरु जी के बलिदान ने भी मतांतरण की प्रक्रिया को केवल समाप्त ही नहीं किया, बल्कि नए प्रतिमान मुगल सत्ता के सामने चुनौती के रूप में रखे। दृढ़ मन के संकल्प ने बलिदान का नया इतिहास रचा। धर्मांतरण के विरुद्ध यह पहली बड़ी चुनौती थी, जिसने एशिया के देशों का सोच बदल दिया। शांत और अडोल रहकर उन्होंने अत्याचार का केवल सामना ही नहीं किया, बल्कि वैश्विक चिंतन में त्याग, सेवा और समरसता के सनातन मूल्यों के प्रति अडिग इच्छा की अभिव्यक्ति की। गुरु जी का यह महान त्याग सृष्टि की चादर बनकर उभरा, हिंद की चादर बन कर लहराया और विश्व में मानवाधिकार की पताका बनकर अपनी संकल्प सिद्धि को प्रमाणित किया।