केवल सच बोलना नहीं होता सत्य, जानिए कैसे यह आपकी चेतना का एक गुण है
जो अभी है और अपरिवर्तनशील है, उसके साथ होना ही सत्य है। यह ज्ञान कि हमारे भीतर ऐसा कुछ है जो अपरिवर्तनशील है, वही सत्य है। ...और पढ़ें
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सत्य केवल शब्द नहीं, चेतना का गुण है
HighLights
सत्य अपरिवर्तनशील चेतना के साथ प्रतिबद्धता है
सत्यनिष्ठता कर्मों में सिद्धि और सफलता लाती है
सत्य हृदय की सरलता और शुद्ध इरादों में निहित है
श्री श्री रवि शंकर (आर्ट आफ लिविंग के प्रणेता, आध्यात्मिक गुरु)। सत्य का अर्थ केवल सच बोलना ही नहीं है। सत्य केवल शब्द मात्र नहीं है, बल्कि अपरिवर्तनशील के साथ पूर्ण प्रतिबद्धता ही सत्य है। लोग सत्य को मात्र सच बोलना समझते हैं और कड़वा बोलने लगते हैं। जब आप सत्य बोलना चाहते हैं, तो आपको कठोर होने की आवश्यकता नहीं है। अनेक लोग यह कहकर अपनी कठोरता को उचित ठहराते हैं कि यह सत्य है। आप सत्यनिष्ठ हैं, यह उत्तम और आवश्यक है, परंतु इस बात का ध्यान रखें कि इससे लोग आहत न हों।
सत्य ही जीतता है
सत्य में स्थित होने से आपके कर्म में सिद्धि आती है। आप जो भी काम करते हो, उसका फल मिलने लगता है। कई बार लोग बहुत मेहनत करते हैं फिर भी उन्हें कोई परिणाम नहीं मिलता, क्योंकि उनके भीतर सत्य-चेतना का भाव नहीं होता। जब हमारे भीतर सत्य और शुद्ध चैतन्य होता है, तब किसी भी कर्म का फल तुरंत मिलने लगता है और कार्य में सफलता प्राप्त होती है।
जो व्यक्ति सत्य के लिए प्रतिबद्ध है और अपनी चेतना के अस्तित्व के प्रति निष्ठावान है, उसे सफलता बड़ी आसानी से मिल जाती है; सफलता उसके पीछे आती है। सत्यमेव जयते। कभी यदि ऐसा लगता भी है कि सत्य परास्त हो रहा है, तो भी अंततः सत्य ही जीतता है। सत्य में स्थापित होने का अर्थ है, उस तत्व के साथ स्थिर हो जाना जो अपरिवर्तनीय है। सत्य-चेतना वही अवस्था है जिसमें व्यक्ति अपने भीतर उस अपरिवर्तनीय तत्व को अनुभव करता है। सत्य सदैव आपको शक्ति, सहजता देता है और स्थिरता भी लाता है।
कहा कहते हैं भगवान श्रीकृष्ण
सत्य मात्र शब्दों का नहीं, बल्कि चैतन्य का गुण है। जब भी तुम असत्य कहते हो, तो तुम्हारी चेतना अस्त-व्यस्त और शक्तिविहीन हो जाती है।
जो सत्य नहीं है, उसका कोई अस्तित्व नहीं होता इसीलिए उसे असत्य कहते हैं। अगर वह कहीं अस्तित्व में हो, तो वह सत्य बन जाएगा; अर्थात् जो भी अस्तित्व में है, वह सत्य है। असत्य वह है, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। छाया का कोई अस्तित्व नहीं होता, प्रकाश का अस्तित्व होता है। छाया केवल दिखाई देती है, उसका वास्तविक अस्तित्व नहीं है। आप छाया को पकड़ने की कोशिश करें - क्या आप उसे पकड़ सकते हैं? आप प्रकाश को सीमित कर सकते हैं, लेकिन छाया को नहीं, क्योंकि छाया कोई वास्तविक वस्तु नहीं है जो वास्तव में अस्तित्व में हो।
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श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि जो अस्तित्व में है वही सत्य है, और असत्य का कोई अस्तित्व नहीं है। यदि आप कहें कि कोई चीज़ सत्य है लेकिन उसका अस्तित्व नहीं है, तो यह असंभव है; और यदि आप कहें कि कोई चीज अस्तित्व में है लेकिन वह असत्य है, तो यह भी असंभव है।
इस कथा से जानें सत्य का महत्व
एक बार एक सम्राट ने कहा कि मैं अपने देश में असत्य कहने वाले किसी भी व्यक्ति को दंडित करने जा रहा हूं। इस नियम की घोषणा की गई कि असत्य कहने वाले किसी भी व्यक्ति को मृत्युदंड दिया जाएगा। राज्य के सभी व्यापारी एक साथ इकट्ठा हुए और बोले कि हम व्यापार कैसे कर सकते हैं? हम हमेशा अपनी वस्तुओं को यह कहते हुए बेचते हैं कि ये सबसे अच्छी हैं, यह जानते हुए भी कि वे उतनी अच्छी नहीं होतीं। हम कम कीमत पर खरीदते हैं और उन्हें अधिक कीमत पर बेचते हैं। इस प्रकार वे सभी असत्य का आचरण कर रहे थे।
चिकित्सकों का भी यही हाल था, उन्हें भी मरीजों को बहुत शीघ्र स्वस्थ हो जाने का भरोसा दिलाना ही पड़ता था। सारे वकील एक साथ इकट्ठे हुए और विचार-विमर्श करना शुरू किया। इससे तो वकालत, वाद-विवाद और अदालत के सभी कार्य बंद हो जाएंगे। अंततः बहुत विचार-विमर्श करने के बाद वे सभी राज्य के एक अत्यंत बुद्धिमान मंत्री के पास पहुँचे और बोले कि, "महामंत्री! अब आप ही इस समस्या का निवारण कीजिए।"
निकाला गया यह निष्कर्ष
मंत्री ने महल में प्रवेश कर राजा के शयन-कक्ष में जाने की कोशिश की, तब वहाँ के पहरेदारों ने उसे रोककर पूछा, “तुम कहां जा रहे हो?”
उस बुद्धिमान मंत्री ने जवाब दिया, “मैं मृत्युदंड पाने के लिए जा रहा हूं।” यह एक झूठ था। यदि मंत्री को असत्य कहने के इस अपराध के लिए मृत्युदंड दिया जाता, तब उसकी कही गई बात सत्य हो जाती। यदि मंत्री को मृत्युदंड न दिया जाता, तो कानून का उल्लंघन होता; और यदि दिया जाता, तब वह निरपराध सिद्ध होता।
अतः बुद्धिजीवी मंत्रियों की एक बड़ी सभा बुलाई गई और 'सत्य क्या है?', इस पर वाद-विवाद प्रारंभ किया गया।
अंततः सभी इस निष्कर्ष पर पहुँचे और कहा, "सत्य वह नहीं है जो कहा जाता है। जो भी हम कहते हैं वह असत्य बन जाता है। आप जैसे ही कुछ कहते हो, उसमें जो अस्तित्वगत है, वह विकृत हो जाता है। जो अस्तित्वगत है, वही सत्य है। जो तुम्हारा सच्चा स्वरूप है, उस पर ध्यान रखना ही सत्य का आचरण है। अपने हृदय से सच्चा और नेक नीयत होना ही सत्य है। मन के इरादों में सरलता और स्पष्टता होना ही सत्य है।"