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    अपमान और गलत व्यवहार के बीच भी कैसे रहें प्रसन्न? अपनाएं ये जरूरी बदलाव

    By Jagran NewsEdited By: Vaishnavi Dwivedi
    Updated: Mon, 27 Apr 2026 02:23 PM (IST)

    अच्छे वातावरण में प्रसन्न रहना स्वाभाविक है, पर विपरीत परिस्थितियों में आप प्रसन्न और स्वाभाविक स्थिति में रह पाएंगे जब आपके भीतर होगी आंतरिक शांति और ...और पढ़ें

    BK Shivani Wisdom: किसी की क्या मजाल कि आपको दुखी कर दे!

    BK Shivani Wisdom: किसी की क्या मजाल कि आपको दुखी कर दे!

    ब्रह्मा कुमारी शिवानी (प्रेरक वक्ता)। कुछ लोग आपसे वह व्यवहार करते हैं, जो आपको पसंद नहीं है। वास्तव में उनके पास उतनी ही शक्ति व समझ है, जिससे वह जो सही समझेंगे वही करेंगे। झूठ बोलेंगे। क्रोध करेंगे। गलत व्यवहार करेंगे। धोखा देंगे। वे सब कुछ कर सकते हैं, लेकिन जब तक आप न चाहें, वे आपके मन के अंदर घुस नहीं सकते। वास्तविकता यह है कि कई बार हम कह देते हैं कि उन्होंने मेरे मन को चोट पहुंचाई, मेरा अपमान किया, लेकिन यह तो हमारे मन का रोना है। वे हमारे साथ कुछ नहीं कर सकते हैं। वे सिर्फ बोल सकते हैं या कुछ गलत व्यवहार कर सकते हैं। अब आपके पास यह विकल्प है कि उन्होंने जो बोला है, वह आप लें या उसे न लें। अगर लें तो कितना लें? फिर, अगर रोना है तो कितना और कब तक रोना है? उनकी बात को पकड़कर रखना है या छोड़ना है? वास्तव में, छोड़ने या न छोड़ने की शक्ति हमारे पास है, लेकिन हम उस शक्ति का उपयोग नहीं करते। हम सिर्फ दोष लगाते हैं कि उनके कारण ऐसा हुआ। ऐसे बोलकर हम अपनी शक्ति का उपयोग करना बंद कर देते हैं। इससे हमारी उपयोग की क्षमता और भी कम होती जाती है।

    मान लीजिए किसी ने आपको कभी दुख पहुंचाया। जब उसने दुख पहुंचाया तो आपने कैसे प्रतिक्रिया की? अकसर लोगों के मन में चलता है, कितना भी करो फिर भी सुनने को मिलता है, मेरा तो यहां कोई आदर ही नहीं है, बस करते जाओ इस घर केलिए, कोई एहसान नहीं। जब मेरे अंदर ऐसा विचार आया तो मेरे मन का रोना शुरू हो गया। जब मैं मन में रोई तो मैंने यह नहीं कहा कि मैंने ऐसा विचार स्वयं सृजित किया है। मैं दूसरों को कहने लगी कि आपने ही मुझे रुलाया। इस प्रकार मैंने सारी शक्ति किसको दे दी? उसको। फिर हम उसकी तरफ देखते हैं कि वह क्षमा मांगे, तब मैं ठीक हूंगी। वह कहता है मैने तो कुछ गलत नहीं कहा, मैं क्यों क्षमा मांगूं? फिर मैंने कहा तो ठीक है, तब तक मैं रोती रहूंगी जब तक आप क्षमा नहीं मांगते। जितनी देर हम रो रहे हैं, हम यह जता रहे हैं कि सिर्फ उनके कारण हमें दुख पहुंचा। इससे भी बड़ी चोट हम अपने को तब लगाते हैं, जब हम कहते हैं कि उनकी यह वाली बात हम कभी नहीं भूलेंगे।

    देखिए, उन्होंने जो किया वह किया। कोई नहीं कह सकता कि उन्होंने सही किया। लेकिन उनके पास उतनी ही शक्ति थी, जिसका उन्होंने उपयोग किया। गलत काम करके उन्होंने अपनी शक्ति को कम कर लिया। उनके उस कर्म को देखकर व सुनकर मैने जो सोचा, बोला या किया वह मेरा कर्म बना। यह ठीक है कि उनके कर्म ने उनकी शक्ति घटाई, लेकिन उनके कर्म को देखकर मैंने जो कर्म किया, उससे मैने अपनी शक्ति को बढ़ाया या घटाया, वह मेरा अपना ही विकल्प था।

    अगर दुख, ग्लानि, निंदा व अपमान वाली नकारात्मक परिस्थितियों में भी मुझे अपनी संतुलन तथा सकारात्मक मनोस्थिति को बनाए रखना है तो मुझे अपने सोच, वृत्ति, दृष्टिकोण वा आचरण में सकारात्मक बदलाव लाने की आवश्यकता है। इसके लिए मुझे अपनी मन की शांति, प्रसन्नता, संतुष्टि, स्थिरता, संतुलन, करुणा व संवेदनशीलता आदि आंतरिक शक्तियों को विकसित करने की आवश्यकता है। इसके लिए सहज राजयोग वा परमात्म योग का नियमित अभ्यास करने की आवश्यकता है, जिसके लिए मुझे रोज सुबह अथवा शाम कम से कम आधा घंटा स्वयं को देना है। मनन, चिंतन व अध्ययन द्वारा अगर हम घर के अंदर अच्छे सोच, वृत्ति व व्यवहार रखते हैं तो वह हमारा घर का वातावरण सकारात्मक एवं सुखदाई बनता है। घर का वातावरण ऐसा होना चाहिए कि उसमें कोई भी प्रवेश करे तो वह मन की शांति व सुकून महसूस करें।

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    घर का वातावरण हमारे संकल्प व वृत्ति से बनता है। घर हो या बाहर, सब जगह लोग समान हैं, लेकिन उनकी विचार प्रक्रिया अलग-अलग है, जिससे उन जगहों का वातावरण अलग-अलग हो जाता है। अगर खुद को व बच्चों को शक्तिशाली व प्रतिभाशाली बनाना है एवं दुखदाई स्थिति में भी शांत, संतुलित व सुखदाई रहना चाहते हैं तो पहले अपने मन और घर के वातावरण को शांतिपूर्ण, सकारात्मक, शुद्ध व शक्तिशाली बनाने की आवश्यकता है। अगर घर में तनाव, क्रोध, दुख या चिंता का वातावरण है तो समझ लीजिए कि बच्चे कमजोर ऊर्जा में बड़े हो रहे हैं। यह और वह ऊर्जा मूलतः हमारी विचार प्रक्रिया से ही सृजित होती है।

    क्या यह संभव है कि सारा दिन हम शांत और सुखी रह सकते हैं? सबसे पहले यह देखें कि प्रसन्नता क्या है ? वास्तव में प्रसन्नता मेरी सोच की उपज है। उदाहरण के तौर पर, मान लीजिए हम अपनी गाड़ी से जा रहे हैं। कोई गलत तरीके से गाड़ी चलाकर हमारी गाड़ी से टकरा जाता है। हमारी गाड़ी को डेंट लग जाता है। अब यह एक दृश्य है, जो अचानक हमारे सामने आया है। इसमें, हम कैसा बरताव करते हैं या प्रतिक्रिया देते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम उससे दुखी होना चाहते हैं या सुखी। उस व्यक्ति के गाड़ी चलाने की तरीका या डेंट कितना बड़ा है आदि बातें मायने नहीं रखेंगी, लेकिन हमारी प्रतिक्रिया और बरताव निर्णय करेगा कि हम पहले की तरह खुश रह सकते हैं या दुखी होंगे ? इस स्थिति में लोगों का अकसर यही प्रतिक्रिया होती है कि अगले को गाड़ी चलाना नहीं आता है, फिर लोगों में गुस्सा भी उभर आता है।

    देखा जाए तो यह ऐसा दृश्य है, जो अचानक आया है और कुछ देर में चला भी जाएगा। लेकिन उस क्षणिक दृश्य के कारण मैंने अपनी प्रसन्नता गंवा दी। हम स्वयं से पूछें कि क्या एक डेंट के लिए हमें अपना बहुमूल्य प्रसन्नता गंवा देना ठीक है? क्या डेंट हमारी प्रसन्नता से अधिक महत्वपूर्ण है। अगर नहीं है तो हमें उस दृश्य पर अलग ढंग से सोचना व प्रतिक्रिया देना है। हम सब सुरक्षित हैं, सामने वालों को भी कुछ नहीं हुआ, सिर्फ गाड़ी में एक डेंट आया, इस पर शुक्रिया करना चाहिए ईश्वर का, जिसने हमारे दुख या नुकसान को छोटा कर दिया। भगवान का धन्यवाद करें तो हमारे पास पहले से जो प्रसन्नता की सकारात्मक ऊर्जा है, वह और भी बढ़ जाती है।

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