भगवान दत्तात्रेय ने 'जल' को क्यों माना अपना गुरु? जानें जीवन को पावन बनाने वाले ये 4 गुप्त सूत्र
भगवान दत्तात्रेय ने 24 गुरुओं से शिक्षा लेने के क्रम में जल से भी शिक्षा ली थी। जल तत्व से ली गई शिक्षा बोध कराती है कि वास्तविक शुद्धि बाह्य अनुष्ठान ...और पढ़ें

दत्तात्रेय महाराज की ये सीख बदल देगी नजरिया
भावताचार्य नारायण दास महंत, श्रीभरतमिलाप आश्रम मायाकुंड, ऋषिकेश। श्रीमद्भागवतमहापुराण के प्रकाश में मानव चेतना के गहनतम रहस्य समुद्घाटित होते हैं। इसके ऐसे अनेक प्रसंग और दृष्टांत हैं, जिनमे जीवन-प्रबंधन और दर्शन के अनेक सूत्र गुंफित हैं। यहां भगवान दत्तात्रेय महाराज यदु को संबोधित करते हुए अपने 24 गुरुओं की गाथा सुनाते हैं।
इस गुरु-परंपरा में 'जल' को गुरु मानकर दत्तात्रेय ने जो दर्शन प्रस्तुत किया है, वह मानवता के आध्यात्मिक और नैतिक समुत्थान का मूलाधार है। भगवान दत्तात्रेय कहते हैं-
स्वच्छः प्रकृतितः स्निग्धो माधुर्यस्तीर्थभूर्नृणाम्।
मुनिः पुनात्यपां मित्रमीक्षोपस्पर्शकीर्तनैः।।
हे राजन! जिस प्रकार जल स्वभाव से ही स्वच्छ, चिकना, मधुर और पवित्र करनेवाला होता है तथा गंगा आदि तीर्थों के दर्शन, स्पर्श और नामोच्चारण से भी लोग पवित्र हो जाते हैं, ऐसे ही साधक को भी स्वभाव से ही शुद्ध, स्निग्ध, मधुरभाषी और लोकपावनकारी होना चाहिए। इसी प्रकार एक आध्यात्मिक साधक को भी अपने दर्शन, स्पर्श और नामोच्चारण से सबको पवित्र कर देना चाहिए।
स्वच्छता जल का नैसर्गिक गुण
स्वच्छता जल का नैसर्गिक गुण है। वह स्वयं निर्मल रहकर ही दूसरों की अशुद्धि दूर करने में समर्थ होता है। भगवान दत्तात्रेय उपदेशित करते हैं, आध्यात्मिक साधक का व्यक्तित्व भी जल की भांति पूर्णतः पारदर्शी होना चाहिए। यह स्वच्छता केवल देह की मृत्तिका या जल से शुद्धि नहीं है, अपितु यह राग, द्वेष, ईर्ष्या, छल और अहंकार रूपी मानसिक कालिमा का उन्मूलन है। जिस प्रकार स्वच्छ जल के तल में पड़ी लघुतम वस्तु भी स्पष्ट दिखाई देती है, उसी प्रकार एक तत्वज्ञानी का हृदय निष्कपट होता है। उसकी कथनी और करनी में कोई भेद नहीं होता। यही वह स्वच्छता है, जो उसके व्यक्तित्व को ईश्वरीय आलोक से आप्लावित कर देती है।
हे राजन! जल में जो स्निग्धता और कोमलता है, वह साधु के हृदय में विद्यमान प्रेम और करुणा का भौतिक स्वरूप है। जल ऊंच-नीच, जाति-पांति या जीव-जंतु के मध्य विभेद नहीं करता। वह राजा और रंक दोनों की पिपासा को समान भाव से तृप्त करता है। ठीक इसी प्रकार, एक संत की दृष्टि 'समत्व' में प्रतिष्ठित होती है। वह 'वसुधैव कुटुंबकम्' के भाव को जीते हुए चराचर में अपने ही आत्मस्वरूप का दर्शन करता है। जल जिस प्रकार शुष्क धरा को सिक्त कर उसे उर्वर बनाता है, ऐसे ही संत का सान्निध्य भी मनुष्य के नीरस और पाषाणवत जीवन में भक्ति के अंकुर प्रस्फुटित कर देता है।
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जीवन का आधार
जल की मधुरता ही जीवन का आधार है। शून्य रस के इस संसार में जल ही रसों का स्वामी है, इसलिए एक तत्वज्ञानी साधु की वाणी में भी वही अगाध माधुर्य होना चाहिए। वह "सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्" के आदर्श का साक्षात विग्रह होता है। संत का व्यवहार कठोरता से रहित होता है। यदि वह सत्य का प्रतिपादन भी करता है, तो उसमें ऐसी सौम्यता और करुणा घुली होती है, जिससे सुनने वाले के हृदय में पीड़ा के स्थान पर आत्मबोध और शांति का प्रादुर्भाव होता है। संत की वाणी जल की मंद ध्वनि की भांति हृदय के कोलाहल को शांत करने वाली होती है।
भगवान दत्तात्रेय के अनुसार, संत तो जंगम तीर्थ अर्थात चलते-फिरते तीर्थ हैं। जल केवल शरीर की बाह्य धूल को धोने की सामर्थ्य रखता है, किंतु संत का दर्शन, स्पर्श और उनके वचनों का श्रवण मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के संचित संस्कारों को परिष्कृत कर देता है। जहां-जहां महापुरुष के चरण पड़ते हैं, वह स्थान स्वयं तीर्थ बन जाता है।
हे राजन! जल की भांति सहज, तरल और समर्पित होना ही साधना की पराकाष्ठा है। जब मनुष्य का अहंकार गलकर जल बन जाता है, तभी वह ईश्वरीय चेतना का संवाहक बन पाता है। भगवान दत्तात्रेय महाभाग की जल तत्व को गुरु मानकर ग्रहण की गई शिक्षा बोध कराती है कि वास्तविक शुद्धि बाह्य अनुष्ठानों में नहीं, अपितु जल सदृश तरलता, मधुरता और पवित्रता से है। संतवृंद समाज की वह दिव्य अमूल्य निधि हैं, जो स्वयं पावन होकर चराचर को भी पावन करते हैं।