महर्षि दुर्वासा का यह श्राप बना था समुद्र मंथन का आधार, इसलिए 'श्री-हीन' हुआ स्वर्ग
आज हम आपको महर्षि दुर्वासा से जुड़ी एक ऐसी कथा बताने जा रहे हैं, जो हमें सिखाती है कि अहंकार बड़े-से-बड़े साम्राज्य का विनाश कर सकता है। ...और पढ़ें
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Maharishi Durvasa curse story (AI Generated Image)
HighLights
महर्षि दुर्वासा का श्राप बना समुद्र मंथन का आधार
देवराज इंद्र के अहंकार से श्री-हीन हो गया था स्वर्ग
भगवान विष्णु ने देवताओं को दी यह सलाह
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू पौराणिक कथाओं में जब भी महर्षि दुर्वासा (Maharishi Durvasa) का नाम आता है तो उनके क्रोध का जिक्र जरूर किया जाता है, असुरों से लेकर देवताओं तक के लिए भय का कारण था। दुर्वासा ऋषि भगवान शिव के अंश माने जाते हैं, जो अपनी शीघ्र शाप देने की प्रवृत्ति के लिए भी जाने जाते हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि कैसे महर्षि दुर्वासा का श्राप समुद्र मंथन का मुख्य आधार बना।
इंद्र देव ने किया अपमान
विष्णु पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, एक बार महर्षि दुर्वासा ने बड़े ही प्रेम से देवराज इंद्र को पारिजात पुष्पों की एक दिव्य माला भेंट की। लेकिन ऐश्वर्य के मद में चूर इंद्र देव ने उस माला का सम्मान नहीं किया और उसे अपने हाथी ऐरावत को पहना दिया। हाथी उस माला की सुगंध से उत्तेजित हो गया और उसने माला को जमीन पर फेंक कर उसे अपने पैरों तले कुचल दिया।
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ऋषि दुर्वासा ने दिया ये श्राप
अपने उपहार का ऐसा अपमान होते देख ऋषि दुर्वासा क्रोध से भर गए। उन्होंने उसी क्षण इंद्र को श्राप दिया कि "जिस लक्ष्मी के अहंकार में तुम इतने अंधे हो गए हो, वह लक्ष्मी आज ही तुम्हें और स्वर्ग को छोड़कर चली जाएंगी। ऋषि दुर्वासा का क्रोध यही शांत नहीं हुआ, उन्होंने आगे कहा कि तुम और समस्त देवता शक्तिहीन और श्री-हीन हो जाओगे।"
भगवान विष्णु ने बताया समाधान
ऋषि के श्राप के प्रभाव से माता लक्ष्मी समुद्र में समा गईं और स्वर्ग की चमक फीकी पड़ने लगी। देवता कमजोर हो गए, जिसका फायदा उठाकर और असुरों ने स्वर्ग पर कब्जा कर लिया। हताश होकर सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में पहुचे और सहायता मांगने लगे। तब प्रभु श्रीहरि ने समाधान बताते हुए कहा कि देवताओं को असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करना होगा। भगवान विष्णु ने देवताओं से कहा कि समुद्र मंथन के दौरान जो 'अमृत' उत्पन्न होगा, उसका पान करके देवता फिर से शक्तिशाली और अमर हो जाएंगे।
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इस तरह हुई मंथन की प्रक्रिया
समुद्र मंथन के लिए स्वयं भगवान विष्णु ने 'कूर्म' (कछुआ) अवतार लिया और उनकी पीठ पर मन्दराचल पर्वत को वासुकि नाग रूपी रस्सी की सहायता से मथा गया। मंथन के दौरान 14 रत्न उत्पन्न हुए और धन की देवी लक्ष्मी पुनः प्रकट हुईं। अंत में धन्वंतरि देव अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। अमृत कलश के लिए देवताओं और असुरों में संघर्ष हुआ। भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया और सभी देवताओं को अमृतपान करवाया, जिससे देवताओं को अपनी शक्तियां वापिस मिल गईं।
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