राम सेतु बनाने के लिए नल और नील ही क्यों थे सक्षम? वाल्मीकि रामायण में छिपा है रहस्य
रामायण में नल और नील ने लंका तक पुल कैसे बनाया, इसका रहस्य उनके बचपन के एक श्राप में छिपा है। यह श्राप बाद में वरदान बन गया, जिससे उनके द्वारा पानी में फेंकी गई कोई भी वस्तु डूबती नहीं थी।

राम सेतु बनाने में नल और नील की अहम भूमिका

समय कम है?
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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हम सभी ने रामायण महाकाव्य को पढ़ा, सुना और देखा जरूर होगा। जब लंकापति रावण मां सीता का छल से हरण कर लेता है, तब श्रीराम और वानर राजा सुग्रीव की सेना मां सीता को खोजते-खोजते समुद्र किनारे पहुंचती है। विशाल समुद्र को पार कर पाना इतना भी आसान नहीं था।
तब दो वानर नल और नील सामने आए जिन्होंने असंभव लगने वाली कल्पना को वास्तव में कर दिखाया। समुद्र पर पत्थरों से बना पुल जिसे पार करके श्रीराम की सेना लंका पहुंची। लेकिन कभी सोचा है कि, आखिर नल और नील ही क्यों इस पुल को बनाने में सक्षम थे, जबकि उस समय भगवान राम की सेना में एक से बढ़कर एक योद्धा थे? इसका जवाब छिपा है वाल्मीकि रामायण में।
बचपन का श्राप बाद में बना वरदान
नल और नील दो भाई जो बचपन में काफी शरारती थे। एक बार ऋषियों द्वारा पूजी गई मूर्तियों को दोनों पानी में फेंक देते हैं, जिससे क्रोधित होकर ऋषि उन्हें श्राप देते हैं कि, तुम दोनों पानी में दो भी फेकोगे वो कभी डूबेगा नहीं। दोनों भाई को मिला ये श्राप आगे चलकर वरदान बनने वाला था, ये किसी को भी खबर नहीं थी।
राम की सेना में वानर सरदार होने के साथ राजा सुग्रीव के प्रधान सेनापति भी थे। दोनों ने काफी जांच मुआयना करने के बाद समुद्र पर पत्थर बिछाकर पुल बांधने का काम शुरू किया था। ये पुल कई किलोमीटर का था, जिसे आज भी सेटालाइट की मदद से साफ-साफ देखा जा सकता है। इन दोनों वानरों का पिता विश्वकर्मा को माना जाता है, जिन्हें देवताओं का वास्तुविद् और भवन निर्माण का जानकार भी माना जाता था।

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कितने दिनों में बनकर तैयार हुआ पुल
वाल्मीकि रामायण में बताया गया है कि, जब प्रभु श्रीराम ने समुद्र से रास्ता मांगने का अनुरोध किया, तो समुद्र ने किसी भी तरह की प्रतिक्रिया नहीं दिखाई। जिसके बाद रामजी नाराज हो जाते हैं और समुद्र को सुखाने के लिए बाण दाग देते हैं, तब वरुण देवता सामने आकर कहते हैं कि, आपकी सेना में दो ऐसे वानर हैं, जो पानी पर भी पुल बना सकते हैं।
इसके बाद नल और नील ने पुल बनाने का काम शुरू किया। वानर सेना नल और नील को पत्थर देती, जिसपर श्रीराम का नाम लिखा जाता है। फिर से इसे पानी में फेंका जाता है, तो यह डूबते नहीं हैं। जिसके बाद दोनों भाई तेजी से लंका की ओर पुल बनाने का काम शुरू कर देते हैं। बताया जाता है कि, इस पुल को बनाने के लिए लकड़ी के साथ-साथ पेड़ों और वृक्षों का भी इस्तेमाल किया गया था।
बताया जाता है कि, राम की सेना ने इस महज 5 दिनों में इस पुल को बनाकर तैयार कर लिया था। जबकि इस पुल की लंबाई कुल 30 मील थी। कुछ रामायण में पुल बनाने का श्रेय नल को दिया जाता है, जबकि नील को सहायक की भूमिका में देखा जाता है।
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