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    जैन धर्म में साधु-साध्वियां मुख पर सफेद कपड़ा 'मुंहपत्ती' क्यों बांधते हैं? इसके कारण नहीं जानते होंगे आप

    Updated: Wed, 15 Jul 2026 02:00 PM (GMT+05:30)

    क्या आपके मन में ऐसे कोई सवाल आते हैं कि जैन धर्म में साधु-साध्वियां मुंह पर सफेद कपड़ा क्यों बांधते हैं? अगर हां, तो हम आपको इसके मुख्य कारणों के बार ...और पढ़ें

    जैन साधु-साध्वियां क्यों बांधते हैं मुंहपत्ती, धार्मिक कारण (Picture Credit: AI Generated)

    जैन साधु-साध्वियां क्यों बांधते हैं मुंहपत्ती, धार्मिक कारण (Picture Credit: AI Generated)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। जिस तरह किसी भी धर्म की अलग मान्यताएं होती हैं वैसे ही जैन धर्म की भी अपनी कुछ परंपराएं हैं जिनका पालन करना उनके धर्म के अनुकूल माना जाता है।

    इस धर्म के साधु और साध्वियों को आपने अक्सर मुंह में सफेद पट्टी बांधे हुए देखा होगा। इसको लेकर मन में कई सवाल भी आते होंगे कि आखिर क्यों इस धर्म के लोग इस तरह से रहते हैं?

    मुंह पर इस तरह की सफेद पट्टी लगाने का क्या मतलब होता है? इस धर्म में मुख्य रूप से दो तरह के लोग होते हैं जिनमें से एक श्वेतांबर और दूसरे दिगंबर होते हैं।

    श्वेतांबर जैन वो साधु होते हैं जो हमेशा सफेद कपड़ों का इस्तेमाल करते हैं और दिगंबर जैन दिशाओं को ही अपना वस्त्र मानते हैं और बिना वस्त्रों के ही रहते हैं। आइए आपको बताते हैं कि जैन धर्म के साधुओं का मुंहपत्ती बांधने के पीछे कारण क्या हैं।

    अहिंसा के अनुयायी होते हैं जैन धर्म के लोग

    जैन साधु मुंहपत्ती इसलिए बांधते हैं क्योंकि ये पूरी तरह से अहिंसा के अनुयायी होते हैं और इनका मानना यह होता है कि सांस लेने की प्रक्रिया में अनजाने में किसी कीड़े या जीव की हत्या न हो जाए इसलिए ये हमेशा मुंह को सफेद कपड़े से ढककर रखते हैं।

    यही नहीं कई बार रास्ते में भी कोई मक्खी या मच्छर इनके मुंह में न जाए, इसलिए ये मुंह ढककर ही रखते हैं। उनका हमेशा इस अवस्था में रहना सूक्ष्म जीवों की रक्षा का संदेश देता है।

    मुख्य रूप से श्वेतांबर जैन मुंह में पट्टी बांध कर रखते हैं क्योंकि इनका मानना है कि वातावरण में जो भी बैक्टीरिया हैं मुंह के अंदर जाने से उनकी हत्या होती है इसलिए उन्हें बचाने के लिए मुंह ढकना सबसे अच्छा विकल्प है।

    जैन ग्रंथों की शुद्धता बनाए रखने के लिए

    जैन धर्म के साधु अक्सर जैन ग्रंथों का पाठ करते हैं और पाठ करते समय उनकी किताब में थूंक की बूंदें न पड़ें और ग्रंथ की शुद्धता बनी रहे इसी वजह से वो मुंह पर हमेशा सफेद कपड़ा बांधकर रहते हैं।

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    इसके साथ ही उनका मानना यह भी होता है कि उनके शरीर का कोई भी इंफेक्शन थूंक या सांस के माध्यम से किसी दूसरे तक न पहुंचे, इसलिए वो हमेशा मुंह को सफेद कपड़े से ढककर रखते हैं।

    जैन धर्म के साधु मुंहपत्ती के साथ कई अन्य नियमों का पालन भी करते हैं जैसे ये जमीन के नीचे पैदा होने वाली चीजों से परहेज करते हैं और जैन धर्म के लोग सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करते हैं और जमीन पर आसान बिछाकर ही सोते हैं। ऐसे सभी नियम जैन धर्म की शुद्धता बनाए रखने की लिए जैन साधु अपनाते हैं।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।