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देवताओं के अमृत से भी बढ़कर है 'काशी का गंगाजल', स्कंद पुराण में दर्ज है महिमा

Updated: Thu, 03 Sep 2026 10:08 AM (IST)

काशी को भगवान शिव द्वारा बसाई गई सबसे प्राचीन नगरी माना जाता है, जहां गंगा नदी का जल अमृत तुल्य ...और पढ़ें

काशी गंगा जल का आध्यात्मिक महत्व (Picture Credits- AI Images)

काशी गंगा जल का आध्यात्मिक महत्व (Picture Credits- AI Images)

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। क्या आप संसार की सबसे प्राचीन नगरी के बारे में कल्पना कर सकते हैं कि वो दिखती कैसी होगी? सुनने में ये थोड़ा हैरान कर सकता है लेकिन भारत में एक ऐसी भी नगरी है जो सबसे प्राचीन बताई जाती है।

इसका नाम 'काशी' है। काशी का जिक्र कई वेद-पुराणों में देखने को मिलता है। पौराणिक मान्यता है कि काशी नगरी को खुद भगवान शिव ने बसाया था, जिस वजह से इसे शिव की नगरी के नाम से भी जाना जाता है।

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स्कंद पुराण में काशी के जल की महिमा

यह उत्तर भारत के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है, जो गंगा नदी के तट पर बसा है और महादेव यहां विश्वनाथ (विश्व के नाथ) रूप में विराजते हैं। क्या आपको पता है कि, शास्त्रों में काशी में बहने वाली गंगा नदी को अमृत के समान माना जाता है।

यह श्लोक काशी (वाराणसी) और मणिकर्णिका घाट की महिमा के बारे में बात करता है। स्कन्द पुराण के काशी खंड से जुड़ा एक श्लोक-

पयोपि यत्रत्यमचिन्त्यवैभवं दिविस्थितासाधुसुधाप्यते मुधा।
तथाप्रसूतेस्तुपयोधरे पयो न पीयते पीतमिदं यदि क्वचित् ॥

अर्थात्- काशी (वाराणसी) के जल की शक्ति हमारी सोच से भी परे है। देवता गण प्रशंसा करके जिस अमृत का पान करते हैं, वह इस काशी के जल की तुलना में किसी भी योग्य नहीं है! जो काशी के जल का एक बार पान कर लेता है, उसे फिर से जन्म लेकर माता का स्तनपान नहीं करना पड़ता है। लेकिन अमृतपान से पुनर्जन्म समाप्त नहीं होता है।

स्कंद पुराण के काशी खंड में कई अध्यायों में पवित्र गंगा नदी के महत्व और दिव्य शक्तियों का वर्णन किया गया है। काशी खंड अध्याय 27, श्लोक 46 में कहा गया है कि-

गृहाद् गंगावगाहार्थ गच्छतस्तु पदे पदे
विनाशकारीनि व्रजन्त्येव पपान्यास्य शरीरत:

अर्थात्- गंगा नदी में नहाने के लिए आगे बढ़ते समय भक्तों द्वारा उठाए गए हर कदम के साथ उसके शरीर से पाप दूर होने लगते हैं। जब कोई भक्त काले तिल से अपने पूर्वजों के लिए अनुष्ठान करता है, तो उसके पूर्वज शांतिपूर्वक स्वर्ग में प्रवेश करते हैं।

यदि कोई भक्त गंगा नदी में विधिपूर्वक अनुष्ठान करता है, तो वह निश्चित तौर पर नरक से छुटकारा पा लेता है।

काशी में गंगा नदी बारहमास

कहते हैं कि, जब गंगा ने काशी में पूरी शक्ति के साथ प्रवेश किया, तो भगवान शिव ने काशी के प्रवेश द्वार से ठीक पहले अपना त्रिशूल फेंका, जिससे नदी का प्रवाह कुछ धीमा हो गया। गंगा ने भगवान शिव को यह वचन दिया कि वह हमेशा काशी में ही रहेगी और यहां के निवासियों की सेवा करेगी।

इसलिए काशी में गंगा बारहमासी है, जबकि अन्य स्थानों पर ऐसा देखने को नहीं मिलता है। इसके अलावा अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु काशी में होती है, तो उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।