काशी के तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर का रहस्य क्या है? जहां हर साल तिल के बराबर बढ़ता है स्वयंभू शिवलिंग
काशी के तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर में एक अनोखा स्वयंभू शिवलिंग है, जिसके बारे में मान्यता है कि यह हर साल तिल के बराबर बढ़ता है।

तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर जहां शिवलिंग हर साल बढ़ता है (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
काशी में स्थित है प्राचीन तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर।
यहां का शिवलिंग हर साल तिल के बराबर बढ़ता है।
ऋषि विभांड की तपस्या से जुड़ा है मंदिर का इतिहास।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हमारे देश में मंदिरों का इतिहास काफी पुराना है और प्रत्येक मंदिर की अपनी अलग कहानी है। ऐसे ही कई शिव मंदिर हैं जहां सावन में भक्तों की भीड़ लगी रहती है और लोग मीलों दूर से आकर इन मंदिरों में दर्शन परकापत करते हैं।
ऐसा ही एक मंदिर है वाराणसी यानी काशी का तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर जहां मौजूद शिवलिंग हर साल तिल के बराबर बढ़ता है। वाराणसी में वैसे तो कदम-कदम पर प्राचीन शिव मंदिर और उनसे जुड़ी अनोखी मान्यताएं हैं, लेकिन इस मंदिर की अपनी लगा कहानी है जो इसे और मंदिरों से अलग बनाती है।
इसी वजह से यह मंदिर श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का केंद्र बना रहता है। आइए जानें आखिर क्या खास है इस मंदिर में और इसके रहस्य क्या हैं?
कहां स्थित है तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर?
तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर वाराणसी के पांडे हवेली और भेलूपुर क्षेत्र में स्थित है। मंदिर का वर्तमान ढांचा 18वीं शताब्दी का माना जाता है, जबकि यहां मौजूद शिवलिंग को इससे कहीं अधिक प्राचीन और स्वयंभू माना जाता है। इस शिवलिंग के लिए मान्यता है कि यह अपने आप प्रकट हुआ था और धीरे-धीरे लोगों के बीच आस्था का एक बड़ा केंद्र बन गया।
हर साल तिल के बराबर बढ़ता है शिवलिंग
काशी के इस मंदिर की सबसे खास मान्यता यह है कि इस मंदिर का स्वयंभू शिवलिंग से हर साल तिल के बराबर बढ़ जाता है और यह माना जाता है कि मकर संक्रांति के दिन शिवलिंग का यह आकार बढ़ता है।
इसी मान्यता के कारण भगवान शिव के इस स्वरूप को तिलभांडेश्वर नाम दिया गया है। वैसे तो शिवलिंग की यह वृद्धि इतनी सूक्ष्म है कि इसे सामान्य आंखों से तुरंत देख पाना भी मुश्किल है, लेकिन सदियों से चली आ रही मान्यता के अनुसार भक्त इसके आकार को हर साल बढ़ता हुआ महसूस करते हैं।
क्या है तिलभांडेश्वर महादेव की पौराणिक कथा?
मंदिर से जुड़ी एक प्रमुख कथा ऋषि विभांड से संबंधित है। मान्यता के अनुसार, ऋषि विभांड ने इस स्थान पर भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी और पूजा के दौरान शिवलिंग पर तिल तथा गंगाजल अर्पित किया।
एक दिन उसी स्थान पर शिवलिंग का प्राकट्य हुआ। चूंकि यह शिवलिंग तिल के स्थान पर प्रकट हुआ था, इसलिए इसका नाम तिलभांडेश्वर पड़ा। एक और मान्यता के अनुसार पुराने समय में इस क्षेत्र में तिल की खेती होती थी और एक दिन उसी स्थान लोगों को शिवलिंग दिखाई दिया जो स्वयंभू शिवलिंग के नाम से प्रसिद्द हुआ।
वास्तव में इस मंदिर का इतिहास अत्यंत पुराना है जो इसे अन्य मंदिरों की तुलना में एक खास स्थान देता है और भक्तों के बीच सदियों से आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
यह भी पढ़ें- गुप्तेश्वर गुफा मंदिर: ओडिशा की रहस्यमयी गुफा में विराजमान स्वयंभू शिवलिंग की अनोखी कहानी
यह भी पढ़ें- जम्मू शहर का सबसे पुराना शिव मंदिर! काशी से लाए गए 11 स्फटिक शिवलिंग हैं खास; एक क्विंटल की घंटी भी खींचती ध्यान
Source: https://kashi.gov.in/
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।
