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शनिदेव को सरसों का तेल ही क्यों चढ़ाया जाता है? यहां जानें इसका धार्मिक कारण

Published: Sun, 30 Aug 2026 03:37 PM (IST)

शनिदेव को कर्मों का देवता माना जाता है और उन्हें प्रसन्न करने के लिए लोग शनि की शिला पर सरसों ...और पढ़ें

शनिदेव को सरसों का तेल क्यों चढ़ाते हैं धार्मिक महत्व और पौराणिक कथा (Picture Credit: AI Genrated)

शनिदेव को सरसों का तेल क्यों चढ़ाते हैं धार्मिक महत्व और पौराणिक कथा (Picture Credit: AI Genrated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में शनिदेव को कर्मों का देवता माना जाता है और ऐसा कहा जाता है कि वो व्यक्ति को अच्छे और बुरे कर्मों के अनुसार ही फल देते हैं। यही नहीं शनिदेव को अनुशासन अत्यंत प्रिय है और जो लोग अनुशासित रहकर काम करते हैं उनके जीवन में समृद्धि बनी रहती है।

हर व्यक्ति की राशि में शनि की साढ़ेसाती भी कभी न कभी जरूर आती है और यह समय भी उन्हें कर्मों का फल देने के लिए ही होता है। शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए कुछ ऐसे उपाय आजमाए जाते हैं जिनसे व्यक्ति को शनि दोषों से मुक्ति भी मिलती है और जीवन में खुशहाली बनी रहती है।

इन्हीं उपायों में से एक है शनिदेव को सरसों का तेल चढ़ाना। शनि मंदिरों से लेकर शनिवार के दिन तक, शनि की साढ़ेसाती से लेकर शनि दोष के उपायों तक, सरसों का तेल चढ़ाने का गहरा ज्योतिषीय महत्व है। आइए आपको बताते हैं आखिर क्यों शनिदेव को सरसों का तेल ही चढ़ाया जाता है?

शनि देव को तेल क्यों चढ़ाया जाता है?

शनिदेव को सरसों का तेल चढ़ाने का एक मुख्य कारण है कि तेल घर्षण और दर्द से राहत का प्रतीक माना जाता है। शनि देव जीवन में आने वाली मुश्किलों, संघर्षों, देरी और दबाव का प्रतिनिधित्व करते हैं।

तेल चढ़ाना एक प्रतीकात्मक प्रार्थना का रूप माना जाता है जिसमें शनि देव से कर्मों के घर्षण को कम करने, कष्टों को हल्का करने और चुनौतियों की तीव्रता को कम करने के लिए कहा जाता है। इसीलिए ऐसी मान्यता है कि सरसों का तेल चढ़ाने से भक्तों को राहत मिलती है।

शनि ग्रह स्वभाव से अंधेरा, ठंडा, धीमा और भारी होता है। सरसों के तेल में भी भारीपन, जमीन से जुड़ाव और गर्मी पैदा करने वाले गुण होते हैं। इस वजह से तेल शनि की ठंडी और कठोर ऊर्जा को संतुलित करता है। साथ ही, यह शनि के नकारात्मक प्रभावों को शांत करता है। शनिदेव की तेल चढ़ाना एक ग्रह दोषों को दूर करने के उपाय के रूप में काम करता है।

रामायण काल से जुड़ी है कथा

शनिदेव को तेल चढ़ाने की कथा रामायण काल से प्रचलित है। इस कथा के अनुसार, एक बार रावण को अपनी शक्तियों का घमंड हो गया और उसने नवग्रहों को भी बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया था।

इन नवग्रहों में से जब शनिदेव ने रावण से कहा कि भविष्य में उसे उसके कर्मों का दंड अवश्य मिलेगा, तो रावण इस बात पर क्रोधित हो उठा और उसने अपनी दिव्य शक्तियों का प्रयोग करके शनिदेव को कारावास में ही उल्टा लटका दिया। उसी समाय हनुमान जी लंका आए और वो श्री राम का संदेशा लेकर आए थे, लेकिन रावण ने उनका भी सम्मान न किया और उनकी पूंछ में आग लगा दी।

क्रोध में आकर हनुमान जी ने अपनी पूंछ से पूरी लंंका जला दी। लंका में आग लगने से उस कारावास में भी आग लग गई और रावण की दिव्य शक्ति खत्म हो गई।

उस समय सभी ग्रह कारावास में बाहर निकल गए, लेकिन उल्टा लटके होने के कारण शनिदेव वहीं रह गए। उस समय शनिदेव की पीड़ा कम करने के लिए हनुमान जी ने उनके पूरे शरीर में सरसों के तेल का लेप किया, जिससे उनकी पीड़ा कम हुई। उसी समय से शनिदेव को सरसों का तेल चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है और इससे भक्तों का कल्याण होता है।

आज भी मान्यता है कि जो व्यक्ति शनिदेव को सरसों का तेल चढ़ाता है उसकी सभी पीड़ाएं दूर होती हैं और उसे कई दोषों से मुक्ति मिलती है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।