क्या आपको पता है, उत्तर भारत में जब सावन आधा बीत जाता है तब दक्षिण में क्यों होती है इसकी शुरुआत?
उत्तर और दक्षिण भारत में सावन मास की शुरुआत अलग-अलग तिथियों पर होती है, जिसका मुख्य कारण दो भिन्न चंद्र कैलेंडर प्रणालियां हैं। ...और पढ़ें

उत्तर और दक्षिण भारत में सावन की शुरुआत अलग-अलग तिथियों पर

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हम सभी जानते हैं कि श्रावण मास का महीना भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के लिए अत्यंत खास माना जाता है। उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक सावन की आध्यात्मिक आस्था को महसूस किया जा सकता है। लेकिन क्या आपको पता है कि, उत्तर और दक्षिण भारत में सावन की शुरुआत अलग तिथि पर होती है।
सुनने में ये थोड़ा हैरान कर सकता है लेकिन यह पूरी तरह सच है। इसके पीछे न किसी तरह की कोई गलती और न ही किसी तरह का भ्रम। इसके पीछे का असल कारण है दो अलग-अलग चंद्र कैलेंडर प्रणालियां आइए जानते हैं इसके बारे में।
अलग तिथि के पीछे चंद्र कैलेंडर की भूमिका
दरअसल उत्तर भारत (North India) पूर्णिमांत चंद्र हिंदू कैलेंडर को फॉलो किया जाता है। जबकि दक्षिण भारत (South India) अमावस्या यानी अमांत चंद्र हिंदू पंचांग का पालन किया जाता है। उत्तर भारत में पूर्णिमांत पंचांग फॉलो करने के कारण महीना पूर्णिमा के अगले दिन से शुरू होता है, जिस वजह से उत्तर भारत में श्रावण मास का महीना आमतौर पर 15 दिन पहले यानी जुलाई के मध्य या उसके आसपास से शुरू हो जाता है, जो अगस्त तक चलता है।
दूसरी तरफ दक्षिण भारत में अमावस्या अमांत पंचांग फॉलो किया जाता है, जिसमें महीने की शुरुआत अमावस्या के बाद होती है। इसलिए दक्षिण भारत में श्रावण मास उत्तर भारत की तुलना में 15 दिन बाद से शुरू होता है।

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उत्तर भारत में सावन 2026 की तिथि
इस साल उत्तर भारत में सावन की भव्य शुरुआत 30 जुलाई 2026 को हुई, जो 28 अगस्त 2026 तक चलेगी।
दक्षिण भारत में सावन की शुरुआत कब?
दक्षिण भारत में सावन की शुरुआत तिथि- 13 अगस्त 2026
समापन तिथि- 11 सितंबर 2026
उत्तर और दक्षिण भारत में श्रावण मास का महत्व
दक्षिण और उत्तर भारत में सावन की तिथि में अंतर होने के पीछे कोई विसंगति नहीं, बल्कि दो मान्य वैदिक पंचांग प्रणालियां हैं। भले ही दोनों जगह श्रावण मास की तिथि में अंतर हो, लेकिन दोनों का आध्यात्मिक महत्व एक जैसा ही है।
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दोनों ही जगह चांद एक ही चरण में होता है, बस शुरुआत का तरीका अलग होता है। ये सदियों पुरानी क्षेत्रीय परंपराओं के आधार पर अनुकूल (adaptation) है। दोनों प्रणाली अपनी-अपनी जगह बिल्कुल सही हैं, क्योंकि भले ही सनातन धर्म में रास्ते अलग हो सकते हैं लेकिन चंद्रमा और उसके पीछे की आस्था एक ही रहती है।
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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।