क्या आप जानते हैं बड़ों के चरण स्पर्श करने के बाद माथे पर हाथ लगाने की असली वजह?
भारतीय परंपरा में बड़ों के पैर छूने के बाद माथे पर हाथ क्यों लगाते हैं? एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषियों से जानें इसके पीछे छिपे ऊर्जा के प्रवाह और आध्यात् ...और पढ़ें

बड़ों के पैर छूने की परंपरा (AI-Generated Image)

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जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में संस्कारों का बहुत अधिक महत्व है। बचपन से ही हमें घरों में यह सिखाया जाता है कि जब भी घर में कोई बुजुर्ग या सम्मानित व्यक्ति आए, तो हमें उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेना चाहिए। इतना ही नहीं, किसी शुभ कार्य पर जाने से पहले, परीक्षा देने से पहले या त्योहारों के दिन भी बड़ों के पैर छूने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
आपने गौर किया होगा कि हम सिर्फ पैर ही नहीं छूते, बल्कि पैर छूने के बाद अपने दोनों हाथों को अपने माथे (सिर) या आंखों से भी लगाते हैं। बहुत से लोग इसे केवल एक आदत या सम्मान दिखाने का सामान्य तरीका मानते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसके पीछे की असल वजह क्या है? बड़ों के पैर छूने के बाद माथे पर हाथ क्यों लगाया जाता है? इसके पीछे क्या मान्यता है? आइए इस आर्टिकल के जरिए समझते हैं।
एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषियों के अनुसार, हमारी परंपराओं में बड़ों के चरण स्पर्श करना अत्यंत पूजनीय माना गया है। लेकिन, चरण छूने के तुरंत बाद हाथों को अपने माथे से लगाने के पीछे एक गहरा आध्यात्मिक और ऊर्जा-विज्ञान संबंधी कारण है।
ऊर्जा का स्थानांतरण और आध्यात्मिक कारण
पैर छूकर माथे पर हाथ लगाने के मुख्य कारण और नियम इस प्रकार हैं:
- ऊर्जा का प्रवाह: हमारे शरीर में हाथों की उंगलियां और पैरों के अंगूठे ऊर्जा के मुख्य प्रवाह केंद्र माने जाते हैं। जब हम झुककर किसी बड़े या पूज्य व्यक्ति के पैर छूते हैं, तो उनकी शुभ ऊर्जा उनके पैरों के जरिए हमारे हाथों में प्रवाहित होती है।
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- आज्ञा चक्र और बुद्धि का विकास: पैर छूने के बाद जब हम उन हाथों को अपने माथे पर लगाते हैं, तो हम उस प्राप्त ऊर्जा और आशीर्वाद को अपनी बुद्धि और चेतना का हिस्सा बना लेते हैं। माथा विचारों का केंद्र है; वहां बड़ों के आशीर्वाद की ऊर्जा पहुंचने से मन में विनम्रता, सद्बुद्धि और शुभ विचारों का विकास होता है।
समर्पण और संस्कारों का आदान-प्रदान
अहंकार का त्याग: पैर छूना हमारी नम्रता और अहंकार के त्याग को दर्शाता है, जबकि माथे पर हाथ लगाना उस आशीर्वाद को सहर्ष स्वीकार करने का प्रतीक है।
संस्कारों का हस्तांतरण: यह क्रिया दो पीढ़ियों के बीच केवल सम्मान का आदान-प्रदान नहीं है, बल्कि संस्कारों और दिव्य ऊर्जा के हस्तांतरण की एक अत्यंत सुंदर प्रणाली है।
यह परंपरा हमें सिखाती है कि हम चाहे जीवन में कितने भी बड़े क्यों न हो जाएं, अपनों से बड़ों के अनुभव और उनके आशीर्वाद के बिना हम अधूरे हैं। यह एक ऐसी वैज्ञानिक प्रक्रिया है जो बिना किसी मशीन के हमारे शरीर में सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) का संचार करती है। जब एक इंसान झुकता है, तो उसका घमंड टूटता है और जब वह उस आशीर्वाद को माथे से लगाता है, तो उसकी सोच पवित्र हो जाती है। यह एक इंसानियत और प्यार से भरा रिश्ता है, जिसे हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों को भी जरूर समझाना चाहिए।
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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।