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    हनुमान जी की पूजा में महिलाओं के लिए क्यों बनाए गए हैं खास नियम? क्या वाकई पैर छूने की मनाही है?

    Updated: Mon, 09 Feb 2026 02:17 PM (GMT+05:30)

    हनुमान जी की पूजा में महिलाओं के लिए कुछ खास नियम बनाए गए हैं। क्या वाकई महिलाएं उनके चरण नहीं छू सकतीं? जानिए ब्रह्मचर्य की मर्यादा और धार्मिक मान्यत ...और पढ़ें

    क्या महिलाएं नहीं छू सकती बजरंगबली के पैर? (Image Source: AI-Generated)

    क्या महिलाएं नहीं छू सकती बजरंगबली के पैर? (Image Source: AI-Generated)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हनुमान जी, जिन्हें हम 'संकटमोचन' के नाम से जानते हैं, हर भक्त के लिए अटूट श्रद्धा के केंद्र हैं। चाहे पुरुष हों या महिलाएं, बजरंगबली की शरण में हर कोई अपनी समस्या का समाधान पाता है। लेकिन, अक्सर एक सवाल मन में आता है कि क्या महिलाएं हनुमान जी की मूर्ति के चरणों को स्पर्श कर सकती हैं? पारंपरिक रूप से ऐसा करने की मनाही है, लेकिन इसके पीछे कोई भेदभाव नहीं, बल्कि एक बहुत ही सुंदर 'मर्यादा' छिपी है।

    ब्रह्मचर्य की अटूट मर्यादा

    धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं के अनुसार, हनुमान जी 'बाल ब्रह्मचारी' हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन प्रभु श्री राम की सेवा और ब्रह्मचर्य के पालन में समर्पित कर दिया। शास्त्रों के अनुसार, हनुमान जी हर महिला को माता के समान मानते हैं। चूंकि, एक पुत्र अपनी माता के चरणों में झुकता है, इसलिए हनुमान जी खुद को महिलाओं से ऊंचा या पूजनीय कहलाने के बजाय उन्हें 'मातृशक्ति' के रूप में देखते हैं। इसी मर्यादा का सम्मान करते हुए महिलाएं उनके चरणों को स्पर्श नहीं करतीं।

    Hanuman puja

    (Image Source: AI-Generated)

    भक्ति में कोई मनाही नहीं

    पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि महिलाएं हनुमान जी की पूजा नहीं कर सकतीं। महिलाएं हनुमान चालीसा का पाठ कर सकती हैं, सुंदरकांड पढ़ सकती हैं और उन्हें प्रसाद भी अर्पित कर सकती हैं। बस 'स्पर्श' न करने के पीछे का उद्देश्य उनके ब्रह्मचर्य व्रत के प्रति सम्मान प्रकट करना है।

    कैसे करें सही तरीके से पूजा?

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महिलाओं को हनुमान जी की पूजा करते समय मूर्ति के सामने सिर झुकाकर प्रणाम करना चाहिए। अगर आप दीप जला रही हैं या सिंदूर चढ़ाना चाहती हैं, तो उसे पुजारी के माध्यम से अर्पित करवाना अधिक श्रेयस्कर माना जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है ताकि एक परम भक्त के संकल्प की मर्यादा बनी रहे।

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