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कर्म, अकर्म और विकर्म के भेद में छिपा है सुखी जीवन का राज, यहां जानें तीनों के बीच का सूक्ष्म अंतर

Published: Mon, 05 Jan 2026 12:15 PM (IST)

श्रीमद्भागवतमहापुराण में जीवन और जगत के महत्त्वपूर्ण बिंदुओं को भगवदीय कथाओं और दृष्टांतों के माध्यम से अभिव्यंजित किया गया है। ...और पढ़ें

मनुष्य को अपने कल्याण के लिए वेदानुसार ही कर्म करने चाहिए

मनुष्य को अपने कल्याण के लिए वेदानुसार ही कर्म करने चाहिए

आचार्य नारायण दास (आध्यात्मिक गुरु, श्रीभरत मिलाप आश्रम, मायाकुंड, ऋषिकेश)। राजा निमि और नौ योगेश्वरों के मध्य संवाद हो रहा है, जिसके अंतर्गत राजा निमि ने अपनी जिज्ञासा को अभिव्यक्त करते हुए कहा- "हे योगीश्वरों! आप हमें बताएं, कर्मयोग क्या है? विकर्म क्या है? अकर्म क्या है? और नैष्कर्म्य क्या है? अर्थात कर्तृत्व, कर्म और कर्मफल की निवृत्ति कैसे संभव है?

राजा निमि की यह जिज्ञासा मनुष्य जीवन के सार को समझने की है, जहां व्यक्ति कर्म करता हुआ भी कर्म के बंधन से मुक्त हो सके। छठे योगीश्वर आविर्होत्र महाभाग राजा की जिज्ञासा का समाधान करते हुए कहते हैं, हे राजन्! कर्म वे कार्य हैं, जो वेद या शास्त्रों द्वारा विहित अर्थात करने योग्य बताए गए हैं।

जैसे यज्ञ, दान, तपस्या, अपने वर्णाश्रम के कर्तव्य आदि। अकर्म का तात्पर्य यह निष्क्रियता नहीं, बल्कि वे कार्य हैं जो निषिद्ध हैं, जो नहीं करने योग्य हैं अर्थात पाप कर्म। विहित कर्मों को छोड़ देना या उनका उल्लंघन करना ही विकर्म है।

आविर्होत्र महाभाग का सबसे महत्वपूर्ण और केंद्रीय विचार यहां यह है कि कर्म, अकर्म और विकर्म का यथार्थ ज्ञान लौकिक रीति अर्थात सामान्य समझ या संसारी व्यवहार से प्राप्त नहीं हो सकता। इस संदर्भ में वेद ही प्रमाण हैं।

ये तीनों कर्म, अकर्म, और विकर्म एकमात्र वेद के द्वारा ही जाने और समझे जाते हैं। वेद मनुष्य द्वारा रचित नहीं हैं, इसलिए इन्हें अपौरुषेय कहा गया है। ये ईश्वर के समान प्रमाणिक हैं, क्योकि वेद ईश्वरीय ज्ञान हैं, इसलिए उनके वास्तविक स्वरूप और इन तीनों कर्मों की यथार्थ प्रतिपादन करने में बड़े-बड़े विद्वान् भी विमोहित हो जाते हैं।

मनुष्य को अपने कल्याण के लिए वेदानुसार ही कर्म करने चाहिए। नैष्कर्म्य की प्राप्ति केवल ज्ञान, भक्ति और फलासक्ति रहित होकर कर्म करने से ही संभव है, जैसा कि कर्मयोग में बताया गया है। इस संवाद में जीवन प्रबंधन के अनेक सूत्र निहित हैं, कर्तव्यपरायणता (कर्मयोग): व्यक्ति को फल की चिंता किए बिना निष्काम भाव और शास्त्रोक्त विधि से प्रीतिपूर्वक कर्म करने चाहिए। यही कर्मयोग है। जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय लेने में केवल लौकिक बुद्धि या जनमत पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, अपितु शाश्वत सिद्धांतों वेद और धर्मग्रंथ को प्रमाण मानना चाहिए।

मनुष्य का अंतिम लक्ष्य कर्मों के फल से उत्पन्न होने वाले बंधन से मुक्त होना है। यह मुक्ति तभी संभव है, जब कर्म स्वार्थ या फलेच्छा से प्रेरित न हों। आविर्होत्र महाभाग ने कहा- व्यक्ति को सत्यनिष्ठ महापुरुषों और धर्मशास्त्रों से मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिए। यह परमार्थिक संवाद लोक को कर्मों के गूढ़ रहस्य से परिचित कराता है, कर्म करो, पर कर्म के बंधन से मुक्त रहो।

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