गरुड़ कथा की सीख: माता-पिता से बगावत आजादी नहीं, बड़ों के मार्गदर्शन से ही मिलता है असली लक्ष्य
केवल चलना कहीं पहुंचने का प्रमाण नहीं है, वह तो साधन मात्र है। चलते समय हमें कहां रुक जाना है, ...और पढ़ें
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युवा पीढ़ी के लिए माता-पिता का मार्गदर्शन ही सफलता की कुंजी
आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण (सिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास, अयोध्या)। जीवन-संग्राम में हम सबको अपने-अपने हिस्से के अमृत का अनुसंधान करना पड़ता है। आसुरी शक्तियां हमें पराजित न कर दें, इसके लिए अमृत को पहचानना होता है, उसको पाने की यात्रा करनी पड़ती है। महाभारत में गरुड द्वारा अमृत लाने की एक कथा कुछ विशिष्ट अर्थ लेकर हमारे सामने आती है, जो युवा पीढ़ी के लिए विशेष ध्यान देने योग्य है। सर्पों की माता कद्रू ने गरुड की माता विनता को एक प्रतियोगिता में छलपूर्वक पराजित कर दिया। प्रतियोगिता की निर्धारित शर्तों के अनुसार विनता कद्रू की दासी हो गईं।
जब विनता के पुत्र गरुड बड़े हुए और उन्होंने अपनी माता को दासी भाव में दुख पाते देखा तो उनसे इसका कारण पूछा। प्रतियोगिता और पराजय की सारी कथा जानकर गरुड ने कद्रू के पुत्रों से पूछा कि मेरी माता को दासीभाव से मुक्त कराने के लिए मुझे क्या करना होगा। सर्पों ने कहा कि तुम हमें अमृत लाकर दे दो तो तुम्हारी मां दासता से मुक्त हो जाएंगी। गरुड ने अपनी मां विनता से कहा कि मैं अमृत लाने जाना चाहता हूं। इस कार्य में अनेक बाधाएं होंगी, अतः आप मेरा मार्गदर्शन करें।
इस यात्रा में मेरा आहार क्या होना चाहिए, वह भी बताएं। गरुड के प्रश्न का उत्तर देती हुई विनता कहती हैं कि पुत्र, जिस आहार से तुम्हारा कंठ जलने लगे और जो तुम्हारे पेट में न पच सके, वह आहार मत करना। मां के निर्देश से उनका आशीर्वाद लेकर अमृत लाने के लिए गए। उन्होंने किसी भी परिस्थिति में अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया और अंततः अत्यंत दुर्लभ अमृत-कलश प्राप्त कर लिया। अमृत-कलश लाकर गरुड ने माता को दासीभाव से मुक्त कराया।
यह कथा हमें एक दृष्टि प्रदान करती है कि जीवन हमें कुछ बड़े लक्ष्य देता है। वह प्रत्येक युग में अमृत-कलश पाना ही नहीं होता। फिर भी, कुछ मूल्यवान पाने का संघर्ष हम सबके सामने आता है। युवा पीढ़ी इस संघर्ष का प्रतिनिधित्व करती है। उसके पास अपनी अमृत-यात्रा का स्पष्ट विचार होना चाहिए, उसका विवेक होना चाहिए, और जो हमारे सफल होकर लौटने की आकुल प्रतीक्षा में हैं, उनका स्मरण हमें होना चाहिए।
आज यह कठिन हो रहा है, एकाकीपन को उत्सव बनाने की चेष्टा हो रही है। अभी हाल ही में देश के एक चर्चित आंदोलन-प्रसंग में नवयुवतियों-युवकों को बड़े जोश के साथ यह कहते देखा-सुना गया कि हमारे अभिभावक हमसे सहमत नहीं हैं और हम उनसे सहमत नहीं हैं। कुछेक ने तो बड़े गर्व से अपने माता-पिता की सम्मतियों के तिरस्कार को अपने वैचारिक स्वातंत्र्य के रूप में परिभाषित करना चाहा, यह चिंतनीय है। नई पीढ़ी के सम्मुख नए प्रश्न होना स्वाभाविक हैं, पर वे सारे प्रश्न मानव-अस्तित्व से उपजते हैं और मनुष्यता बहुत प्राचीन है। समाज-व्यवस्थाओं से, सत्ताओं से, विचारधाराओं से असहमत होते हुए हमें अपनी कक्षा का बोध होना ही चाहिए। एक प्रसंग है कि, किसी बहुत बड़े धावक के गांव में चोर आए, चोरी करके भागे तो शोरगुल मचा।
धावक ने उनका पीछा किया और कई किलोमीटर तक दौड़ गया, पर चोर पकड़ में नहीं आए। वह घंटों बाद निराश होकर लौटा कि चोर मुझसे तेज कैसे भाग सकते हैं। तब गांववालों ने उसे समझाया कि चोर तो कहीं छिप गए, वे उतनी दूर गए ही नहीं, तुमने नाहक इतनी दौड़ लगायी। यह प्रसंग एक अच्छा उदाहरण है हमारी क्षमता और उसके सही विनियोग का। केवल चलना कहीं पहुंचने का प्रमाण नहीं है, वह तो साधन मात्र है। पहुंचने का प्रमाण है रुकना, हमें कहां रुक जाना है, यह समझ विकसित होने से युवा पीढ़ी अपने श्रम को सफलता से जोड़ सकती है। जीवन एक प्रवाह है, हम कहीं किसी भी क्षेत्र में अपूर्व या अनूठे नहीं हैं। हमसे पहले के लोगों ने स्वाधीनता की लड़ाई लड़ी और जीती।
सम्प्रभु भारत, इसका लोकतांत्रिक ढांचा और गर्व करने योग्य एक राष्ट्र हमारे सम्मुख है, जो पूर्वजों से मिला है। भारतीय युवा पीढ़ी दुनिया के उत्कृष्ट लोकतंत्र में अपने हिस्से का अमृत खोजती हुई पीढ़ी है। बेपटरी होने को आतुर राजनीति और विफल होने की आशंकाओं से घिरते लोकतंत्र में अपनी भूमिका को रेखांकित करना वर्तमान भारत की युवा पीढ़ी का महत्तर लक्ष्य हो सकता है। यह तभी संभव है, जब अपनी आकांक्षाओं के लिए लड़ते हुए अपनी प्राप्तियों के लिए कृतज्ञ होना भी हमें आ जाए। सच्चा आंदोलन अपने लिए संभावनाएं खोजना नहीं, अपितु सबके लिए संभावनाएं रचने में है। युवा पीढ़ी के सम्मुख यह चुनौती है।
