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    यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 09, 2023 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

    ज्ञान, भक्ति व कर्म की पूर्णता श्रीराम

    By Jagran NewsEdited By: Shantanoo Mishra
    Updated: Sun, 09 Jul 2023 12:47 PM (IST)

    भगवान श्रीराम ने स्वयं में कोई गुण नहीं देखा अपितु दूसरे के अवगुणों में भी गुण पक्ष को ग्रहण कर उसका उपयोग लोकहित में किया। यही ज्ञान भक्ति और कर्म की ...और पढ़ें

    स्वामी मैथिलीशरण जी से जानिए, किस तरह राम हैं ज्ञान, भक्ति व कर्म की पूर्णता?
    स्वामी मैथिलीशरण जी से जानिए, किस तरह राम हैं ज्ञान, भक्ति व कर्म की पूर्णता?

    स्वामी मैथिलीशरण (संस्थापक अध्यक्ष, श्रीरामकिंकर विचार मिशन) । उपदेश जब ग्रंथ से दिया जाएगा तो लिखने के काम आएगा, जब पढ़कर दिया जाएगा तो सुनने के काम आएगा। उपदेश जब जीवन में चरितार्थ हो जाएगा, तब स्वाभाविक रूप से ग्राह्य और अनुकरणीय हो जाएगा। श्रीरामचरितमानस में लीला और चरित्र दोनों चरितार्थ हैं, जिसमें उपदेश दिया नहीं गया, चरितार्थ करके दिखाया गया है। चरितार्थ भी ऐसे हुआ है कि जिसमें चमत्कार और अप्रासंगिकता नहीं है। भगवान राम ने अपना कोई मूल्यांकन नहीं किया, पर दूसरे के हर कार्य की प्रशंसा की, उन्हें उत्साहित किया। ज्ञान की समझ, भक्ति-भावना और कर्म की शैली में यदि व्यावहारिकता नहीं है, तब साधक के जीवन में ज्ञान, भक्ति और कर्म की त्रिपुटी केवल प्रदर्शन योग्य ही रह जाएगी। उसका शुद्ध प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा। इस सर्वांगीण पूर्णता के साथ पृथ्वी पर मात्र भगवान राम ही अवतरित हुए, जिनका मानवोचित गुणों का निर्वहन करते हुए भी स्वयं का सत्, चित्, और आनंद स्वरूप अपने शुद्ध स्वरूप में बना रहा।

    ज्ञान की व्यावहारिकता है कि किसी से कुछ इच्छा न रखे और सब में एक ही ब्रह्म का साक्षात्कार करे। भक्ति की व्यावहारिकता है कि संसार के सारे संबंधों का आधार भगवान को माने। सहज संतोषी स्वभाव हो। मन में कुटिलता न हो। कर्म की व्यावहारिकता यह है कि व्यक्ति स्वयं को सेवक माने। संसार के लोगों के शुभ और सत्कर्मों की प्रशंसा अवश्य करे। भगवान श्रीराम ने स्वयं में कोई गुण नहीं देखा, अपितु दूसरे के अवगुणों में भी गुण पक्ष को ग्रहण कर उसका उपयोग लोकहित में किया। यही ज्ञान, भक्ति और कर्म की पूर्णता है।

    भगवान श्रीराम हर पल आत्मस्थिति में रहे। वे तनिक भी असंयमित नहीं हुए। असंयम लक्ष्य विमुख कर देता है। जब हम किसी से प्रतिस्पर्धा का भाव रखते हैं, तब उस व्यक्ति के गुण और उसके कार्यों को हम किसी और ढंग से देखते हैं। उसी व्यक्ति से जब हमारा राग होता है, तो हम उसके हर कार्य में श्रेष्ठता ही देखते हैं। द्वेष होने पर हम न्यूनता और दोषों को ही खोजते हैं। आसक्ति होने पर उसके प्रति हम अपना सर्वस्व न्योछावर करने में भी तनिक संकोच नहीं करते हैं। हमारी यह इंद्रधनुषीय दृष्टि और वृत्ति जब किसी पद और अधिकार प्राप्त व्यक्ति के साथ जुड़ जाती हैं, तब वह व्यक्ति विकार को और भी विकृत कर उसे व्यापक बना देता है, तब उस मन:स्थिति में निर्णय देने, सामाजिक व्यवहार करने में वह अपने अधिकारों का दुरुपयोग करता हुआ स्वयं और समाज को गर्त में डाल देता है।

    श्रीरामचरितमानस में गुरु वशिष्ठ ने श्रीभरत के अंदर तब इस त्रिपुटी की प्रधानता स्वीकारी, जब श्रीभरत भगवान की पादुकाओं को अपने सिर पर लेकर आए और गुरुदेव वशिष्ठ से पूछा कि यदि आपका मंगलाशासन हो तो मैं पादुका रूप प्रभु को नंदीग्राम जाकर सिंहासनासीन कर वहीं से राज्य का कार्य संभाल लूंगा? तब गुरुदेव ने मानो भरत से यही कहा कि समुझव (समझ) के रूप में तुम्हारे अंदर विधायिका के गुण हैं, कहब (कथन) के रूप में न्यायपालिका के गुण हैं और करब (करनी) के रूप में कार्यपालिका के गुण हैं। भरत ऐसे भक्त हैं, जिन्होंने अपनी समझ, कथन, और करनी का योग भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया। गुरु वशिष्ठ ने कहा कि भरत! तुम्हारे जीवन में तो धर्मसार है। भरत में यदि किंचित मात्र भी मैं होता तो वे लोक, वेद, राजनीत या साधुनीति में से किसी एक का खंडन अपने स्वाभिमान के नाम पर अपनी स्थापना कर देते। राम से अयोध्या लौटने का आग्रह कर भगवान के अवतार के लक्ष्य को निर्मूल करके सिद्ध कर देते कि मैं जिस कार्य के लिए गया था, वह मैंने पूर्ण करके दिखाया। भरत ने यह सिद्ध नहीं किया कि वे किस कार्य के लिए सारे समाज को लेकर चित्रकूट गए, अपितु यह सिद्ध किया कि हमारे प्रभु भैया श्रीराम क्यों वन गए थे। अपने अहं की स्थापना की जगह हम यदि भगवान की भावना और उद्देश्यों की स्थापना करें तो सारा विश्व अयोध्या होगा और सब जगह रामराज्य होगा।

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    सर्व सामर्थ्य होते हुए भी अहंशून्य होकर स्वयं को भगवान के चरणों अर्पित कर देना ही ज्ञान, भक्ति और कर्म की परिपूर्णता है। भगवान के परम भक्त बालिपुत्र अंगद ने रावण की सभा में अपना एक पैर रोपकर अपने मुष्टिप्रहार से रावण के दसों मुकुटों को सिर से गिरा दिया था, वहीं चार मुकुटों को बीच में उछालकर भगवान के पास भेज दिया था। लंका से लौटकर आए अंगद से जब भगवान श्रीराम ने पूछा कि तुमने ये मुकुट कहां और कैसे प्राप्त किए, तब अंगद ने धर्म और ईश्वर से विमुख व्यक्ति की तात्विक व्याख्या की है। अंगद विनम्र भाव से कहते हैं, प्रभु! ये चार मुकुट नहीं, राजनीति के चार पद हैं, जिन पर चलकर व्यक्ति व्यवहार करते हुए भी परमार्थ को प्राप्त कर लेता है। रावण आपसे और धर्म से विमुख हो चुका है, इसलिए राजनीति के चारों चरणों (साम, दाम, दंड और भेद) का दुरुपयोग कर रहा था, इस कारण मुकुट के रूप में ये चारों उसको छोड़कर आपकी शरण में आ गए हैं।

    रावण ने शेष छह मुकुट जो सिर पर धारण कर रखे हैं, वे साधक के जीवन में रहने वाली षड्संपत्ति (शम, दम, उपरति, तितीक्षा, श्रद्धा और समाधान) हैं। चूंकि रावण उनका भी दुरुपयोग कर रहा था, इसलिए ये षड्संपत्ति न रहकर विकार बनकर रावण के सिर पर शासन कर रहे हैं, जो उसके विनाश के कारण बनेंगे। मेरे प्रभु! गुण तो केवल वे ही हैं, जिन्हें आपने स्वीकारा है। शेष सब अवगुण ही हैं। गुणों का योग जब तक भगवान से नहीं होगा, तब तक व्यक्ति उसका उपयोग और कहां करेगा? क्योंकि भगवान से विभक्त हुए गुण मनुष्य को केवल गुणाभिमानी ही बनाते हैं :

    धर्महीन प्रभु पद विमुख

    काल बिबस दससीस।

    तेहि परिहरि गुन आए

    सुनहु कोसलाधीस।।

    हमारे जीवन में भक्ति, ज्ञान और कर्म का योग जब तक श्रीराम से नहीं होगा, तब तक हम जीवन को दिशा नहीं दे सकते। इसीलिए भगवान राम ने अयोध्या में राज्याभिषेक के पश्चात एक सभा बुलाई और सारगर्भित उपदेश दिया। भगवान ने कहा, चूंकि आप लोग मुझे बहुत प्रिय हैं, इसलिए मैं आपको कुछ नीति का उपदेश देना चाहता हूं। यदि मेरे कहने में कुछ अनुचित लगे तो कृपया भय छोड़कर हमें रोक दीजिएगा। मनुष्य शरीर बहुत भाग्य से प्राप्त होता है। इसका परम लक्ष्य है कि जो हमें प्राप्त है, बस केवल हम उन साधनों और इंद्रियों का सदुपयोग करके स्वार्थ और परमार्थ को सिद्ध कर लें। जो लोग इस शरीर को केवल भोग के लिए उपयोग करते हैं, वे अमृत को छोड़कर विष का सेवन कर रहे हैं। अंत में जब विष का परिणाम आता है, तब वे काल, कर्म और ईश्वर को दोष देकर अपने आपको निर्दोष सिद्ध करते हैं। काल, कर्म, स्वभाव और गुणकृत दोषों के कारण व्यक्ति माया की विकृति का ग्रास हो जाता है। भगवान ने अपने लीला काल में कहीं किसी चमत्कार या मायिक पदार्थों का आश्रय नहीं लिया। न तो स्वयं किसी लक्ष्य की सिद्धि की और न ही किसी को ऐसा उपदेश ही दिया। जो इस दुर्लभ शरीर को पाकर भी भवसागर से पार न हो सकें, उन मनुष्यों से अच्छे तो वे रीछ और वानर हैं, जिन्होंने श्रीराम के रूप में साक्षात परब्रह्म परमात्मा को पाकर स्वयं को धन्य एवं कृतकृत्य कर लिया :

    कृतकृत्य प्रभो सब बानर ये,

    निरखंति तवानन सादर ए।

    धिग जीवन देव सरीर हरे,

    तव भक्ति बिना भव भूलि परे।।